Wednesday, May 31, 2017


फिल्म समीक्षा-
अनारकली ऑफ़ आरा 
-- राजेश कुमार

anarkali of aarah

अनारकली ऑफ़ आरा देखी.. देर से देखने के लिए माफी. इसके शुरुआती दर्शकों में खुद को शुमार करके चले थे. खैर देर से सही, देख ली.
हर वो पत्रकार जो थोडा बहुत सिनेमाई सेन्स रखता है और मन में कहीं सिनेमा से जुड़ने का आग्रह रखता है, उसे अनारकली ऑफ़ आरा से एक सुपर सोनिक पुश मिली है. कुछ ऐसी हिम्मत जो पत्रकार बिरादरी के ही विनोद कापडी की फिल्म मिस टनक पुर हाजिर हो से मिलते मिलते कहीं रह गयी थी.
आपकी फिल्म में एक संघर्ष और जाति, समाज और वर्गभेद की हर वो झलक मिल जाती है जो आपने अपने अनुभवों से देखी और भोगी होगी. बिहार और देश के अन्य हिस्सों में अनारकली सरीखे न जाने कितने पुरुष और महिला किरदार सिस्टम के हाथों सरेआम स्टेज में नोचेघसीटे और दमित होते हैं और  पुलिस प्रशासन मूक दर्शक रहता रहता है. ऐसे में अनारकली को एंग्री यंग वीमेन की छवि में ढालकर आपने सिनेमा के सफल और आजमाए फॉरमूले में अपने मुहावरे करीने से फिट कर दिए हैं. कहीं आर्ट फिल्म की झलक तो कहीं रीजनल जैसा स्वाद देती आपकी फिल्म कम से कम संसाधन में वो सब कर जाती हैं जो प्रकाश झा की गंगाजल बड़े सितारों और संसाधनों पर सवार होकर करती है. हालंकि जबान और कथ्य के मामले में आपकी फिल्म ज्यादा प्रमाणिक दिखती है.
दिल्ली को नंगा करके दिखाने का प्रयास अच्छा है आपका. वर्ना मेट्रो और सीपी के एरियल शॉट्स और झंडेवालान की हनुमान मंदिर के लॉन्ग शॉट्स बेचकर यहाँ के लाइन प्रोड्यूसर्स मुम्बईया फिल्मकारों को बुडबक बनाते रहते हैं. दिल्ली का एक बड़ा हिस्सा इतना ही बेबस और सडांध भरा  है जितना आपने  सेकण्ड हाफ में दिखाया है. नितिन फिल्म जुगाड़ में भी थे और यहाँ भी अच्छे लगते हैं. संजय मिश्रा से ऐसा काम करवाकर आपने उनके शायद दोस्तीयारी और जानपहचान के सारे कर्जे अदा कर दिए. स्वरा को तो अपनी जंजीर और डर्टी पिक्चर दोनों ही एक बार में मिल गयी. हीरामन बेहद मूल और मास्टर स्ट्रोक टाइप एबस्ट्रेक्ट किरदार था. जिस पर सबसे ज्यादा समय सोचा और बहस किया जा सकता है. आपका साहित्य, नाटक और लोकगीतों के प्रति झुकाव नहीं होता तो संगीत इतना सजीव और शाब्दिक अमरत्व से लैस नहीं होता. पूरी टीम बधाई की पात्र है और उसे टीम बनाने के लिए आप को सलाम.
मन कहता है कि अगर इस फिल्म को आप भोजपुरी दर्शकों और भोजपुरी बेल्ट के लिए ही तैयार और रिलीज करते तो ज्यादा कामयाबी हासिल करते. कामयाबी तो खैर आपके लिए कहीं भी हासिल करना मुश्किल नहीं है लेकिन नितिन चंद्रा जो प्रयास भोजपुरी फिल्मों के जरिये कर रहे हैं उसको अनारकली का साथ मिलता तो भोजपुरी दर्शकों को शायद वहां की अश्लील, लिजलिजी और भौडी फिल्मों से कुछ अलग मिलने का रास्ता खुल जाता. यह मेरी निजी राय है.
आखिर में बस इतना... कि मेरी तरह ऐसे ही एकतरफा और अनजाने रिश्तों के तारों से जुड़े हैं आप कई लोगों से. जो आपके काम, संघर्ष और सपनों को मिलते परवाजों से उत्साहित होकर नए सपने देखने और जिद को यकीन में बदलने की हिम्मत कर रहे हैं. आप परदे के पीछे और परदे के बाहर ऐसे ही खिलते , मुस्कराते और लड़ते रहे.....अगली फिल्म के लिए अभी से ढेर सारी आशाओं वाली शुभकामनाएं .....








विशेष इन्टरव्यू-
संगीत और परिवार दोनों साथ हैं - रश्मि अग्रवाल
रश्मि अग्रवाल किसी संगीत घराने से ताल्लुक नहीं रखतीं लेकिन शास्त्रीय संगीत उनकी रगरग में बसता है. अपनी दिलकश आवाज से क्लासिकल, ठुमरी, दादरा और गज़ल गाने वाली रश्मि संगीत की इस यात्रा में परिवार के सुर कभी बेसुरे नहीं होने देतीं. राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी विविध आवाज से जादू जगाने वाली रश्मि ने पिछले दिनों यूनेस्को द्वारा संचालित उजबेकिस्तान में शार्क तरुणअलारी ग्रैंड प्रिक्स प्रतियोगिता जीती है. वह इस प्रतियोगिता को जीतने वाली पहली महिला हैं. गायन में हरफनमौला और संगीत के ऐसे ही कई सफल मुकाम हासिल कर चुकी शास्त्रीय संगीत कलाकार रश्मि अग्रवाल से राजेश कुमार की बातचीत हुई. पेश है मुख्य अंश.

Rashmi agarwal 

संगीत से पहला वास्ता कब पड़ाकब एहसास हुआ कि इसी क्षेत्र में जाना है ?
संगीत से वास्ता तो बचपन से ही था. घर पर रेडियो बड़े ध्यान से सुनते थे. उस वक्त गाने की कैसेट और रिकोर्ड होते नहीं थे. हम इंतज़ार करते थे कागज कलम लेकर कि फलां गाना रेडियो पर आयेगा तो उसे नोट कर लेंगे और बाद में उसे सीखेंगे. फिर कैसेट वगैरह आये और हम सीखते रहे. लेकिन बड़ा मोड आया इंटरमीडिएट के दौरान. उस दौरान हमारी एक टीचर ने मुझे गाते हुए सुना और मुझे संगीत को बतौर सब्जेक्ट लेने के लिए कहा. मैं तो संगीत का सारे गा मा भी नहीं जानते थीलेकिन वे मुझे संगीत शिक्षक कमला बोस के पास ले गयीं. वही मेरी पहली गुरु हैं. उन्हें मैंने कुछ गाकर सुनाया. उन्हें  मेरा गाना पसंद आया.  इस तरह से संगीत की विधिवत ट्रेनिंग शुरू हुई.

क्या ऐसा संभव है कि सिर्फ आवाज़ अच्छी हो और बिना किसी ट्रेनिंग या गुरु के कोई सिंगर बन जाए ?
आवाज़ तो बहुत लोगों की अच्छी होती है लेकिन समझने वाली बात यह है कि आवाज़ के साथसाथ गले में सुर भी हों. हालांकि आजकल बहुत से बच्चे ऐसे भी हैं जो इसी तरह सुनसुन कर सीखते हैं और प्रोफेशनली गाने लगते हैं. लेकिन यह बहुत दिन नहीं चलता. थोड़े दिनों के लिए आपने कोई गाना सुना, उसे कॉपी कर परफोर्म कार दिया, लेकिन बिना संगीत के गहरी समझ के आप ज्यादा समय तक सर्वाइव नहीं कर सकते.

शादी के बाद प्राथमिकताओं में बदलाव आये कभी संगीत के चलते परिवार या रिश्तों में मनमुटाव या कड़वाहट नहीं आई ?
परिवार का हमेशा साथ मिला. शादी के बाद जरूर पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते गैप आया         लेकिन मैंने परिवार को प्राथमिकता दी. उसके बाद अगर दिन में एक घंटा भी मिला तो रियाज किया. इस तरह अपनी संगीत साधना के साथ परिवार कभी पीछे नहीं छोड़ा. पति हमेशा हौसलाफजाई करते रहे.  और रही बार कड़वाहट की तो संगीत इतनी मीठी चीज है कि इसकी वजह से रिश्तों में खटास का सवाल ही नहीं. कभी ऐसा मौका आने ही नहीं दिया कि पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर संगीत को तवज्जो दूं. नए परिवेश में सामंजस्य बिठाने में थोडा समय जरूर लगा लेकिन संगीत और परिवार हमेशा साथसाथ रहा.

जब संगीत कार्यक्रम के सिलसिले में विदेश जाना होता है, परिवार साथ रहता है या अकेले जाती हैं ?
वैसे अक्सर मेरे पति मेरे साथ बाहर जाते हैं. अगर उनके पास समय नहीं तो बच्चे भी साथ चलते हैं.

पति या बच्चे सिर्फ रिश्ते के नाते जाते हैं या इन्हें भी संगीत से लगाव भी है ?
मेरे परिवार में अब सब कानसेन बन गए हैं. अच्छा और बुरा संगीत समझते हैं.  मेरा गाना उन्हें पसंद है  इस लिहाज से वे साथचलते हैं. मेरी बेटी तो संगीत में काफी रूचि ले रही हैहालांकि उसका रुझान क्लासिकल के बजाये वेस्टर्न की तरफ है लेकिन उसके गले में सुर बहुत अच्छा है.

एक बार जगजीत सिंह ने एक श्रोता के सवाल पर उसे डांटते हुए कहा था कि पहले गीत और गज़ल में  फर्क समझों फिर सवाल करोआप से भी कार्यकर्म के दौरान ऐसे इमेच्योर सवाल पूछे जाते है ?
कई बार हमसे भी इसी तरह के अपरिपक्व व बेतुके सवाल पूछे जाते हैं. लेकिन अगर हम ही उनका जवाब नहीं देंगे, उनकी जिज्ञासा या उत्सुकता शांत नहीं करेंगे तो वे समझेंगे कैसे.

तो यह कहना सही होगा कि ज्यादातर लोग क्लासिकल संगीत नहीं समझते ?
हां, काफी हद इस बात की तस्दीक करती हूं. मुझे लगता हैं कि स्कूल कोलेज में हमें संगीत या आर्ट को कम्पलसरी सब्जेक्ट बना चाहिए. इससे  सब संगीतकार या गायक भले ही न बन पाएं लेकिन सुनकार यानी समझदार श्रोता तो बन ही जायेंगे. उनकी संगीत को लेकर समझ तो विकसित होगी ही. 

क्लासिकल संगीत भारत में आम लोगों में कम लोकप्रिय क्यों हैआपने कभी बौलीवुड का रुख करने का नहीं सोचा ?
जो आपकी शिक्षा होती है, आप उसी को लेकर आगे बढ़ते हैं. मैं क्लासिकल को लेकर चली, उस में मास्टर डिग्री ली सो उसी साधना को आगे बढ़ाया. लेकिन शादी के बाद मैंने जरूर ठुमरी और दादर सीखा. समय के साथ बदलना जरूरी है. लिहाजा ठुमरी दादर पर काम करने के बाद मेरा रुझान सूफी की तरफ गयामैंने सूफी संतों के साहित्य का गहराई से अध्ययन किया. सूफी ऐसे विधा है जो दिल को छू जाती है. इस तरह संगीत की यात्रा के कई पड़ाव जीवन में आये और आगे भी आएंगे.

आजकल यूथ के आईपोड और स्मार्टफोन में वेस्टर्न और बौलीवुड गाने भरे हैंआपकी बेटी भी क्लासिकल के बजाये वेस्टर्न का रुझान रखती है. यूथ और आम लोग क्लासिकल से इतना दूर क्यों हैं ?

ये तो पसंद की बात है, जिसे जो अच्छा लगता है सुनता है. लोग क्लासिकल भी सुनते हैं. मेरी बेटी को भी क्लासिकल सुनना पसंद है. अब देखिये क्लासिकल है ही एक खास क्लास के लिए. इसे मास में कैसे सुना जा सकता है. जिन्हें क्लासिकल पसंद आता है वे चलताऊ संगीत नहीं सुनते. रही बात यूथ  की तो जितनी भी यूनीवर्सटी हैं वहां तो यूथ ही क्लासिकल सीख रहे हैं. बिना क्लासिकल के बेस ही नई बनता.

कौन सा गीत है जो मंच पर ज्यादा फरमाइश मे आता है?
मेरे एल्बम के गीत रंग दे मौला की काफी डिमांड आती है. राँझा राँझा भी बिना सुने कोई छोड़ता. लेकिन दमादम मस्त कलंदर गाये बिना कोई शोए एंड नहीं होता.

अभी आपने एल्बम का जिक्र किया तो याद आया कि पिछले दिनों अभय दियोल और सोनू निगम समेत कई लोगों ने टी सीरीज के कोंट्रेक्ट को लेकर सामूहिक विरोध किया था. आपके  भी एल्बम निकले हैं, क्या वाकई संगीत कम्पनियां सिंगर्स के साथ कोंट्रेक्ट की आड़ में ज्यादिती करती हैं ?
असल में संगीत कंपनियां सिंगर के साथ ऐसा अनुबंध तैयार करती हैं जो पूरी तरह से उनके फेवर में होता है. जब हम उनके साथ इस करार में बंध जाते हैं तो हमारा हमारी ही रचना पर कोई अधिकार नहीं रहता. सारा कोपीराइट उनका हो जाता है. एक बार एक बड़ी फिल्मकार ने राँझा राँझा गीत को अपनी  फिल्म में इस्तेमाल करने के लिए हमसे इज़ाज़त माँगी. लेकिन उस करार के चलते ऐसा नहीं कर पाए.

फिल्मों में सूफी गीतों का चलन बढ़ा हैकई फिल्मकार साधारण गीतों को सूफी बताकर बेच रहे हैं. असल में सूफी गीत क्या हैं ?
सूफी के बारे सबसे पहले समझा जरूरी है कि संगीत फी नहीं होत्ता. इसका जो कविता पक्ष है यानी लिरिक्स है वो सूफी होते हैं. संतों ने जो लिखा है उसे अपने अलगअलग संगीत माध्यमों से लोगों तक पहुचाना ही सूफीयाना है. जैसे रब्बी शेरगिल रौक संगीत के जरिये बुल्ले शाह गाते हैं. कोई कबीर गाता  है. नुसरत फ़तेह अली खान कव्वाली में सूफी गाते थे. मैं ठुमरी और अपने प्रयोग के साथ नए अंदाज में सूफी गाती हूँ. अगर आप कोई सूफियाना कलाम गा रहे हैं वो सुनने वालों के दिल तक पहुंच गया तो समझ लीजिए आपका उद्देश्य पूरा हो गया.

कार्यक्रम के दौरान फ़िल्मी हस्तियों से मुलाकात होती है, कभी फिल्म में गाने का ऑफर नहीं मिलता?
जब शो खत्म होता है तो बहुत सारे लोग तारीफ़ में कसीदे पढते है और भविष्य में कुछ काम करने के वादा करते हैं लेकिन लेकिन बाद में कुछ नहीं होता.

इसकी वजह बम्बई के बजाय देल्ही में रहना तो नहीं?
ऐसा नहीं है. आजकल दूरी का मसला ही कहाँ रह गया है. आप सुबह बम्बई से काम करके रात को देल्ही वापस आ सकते हैं. आजकल तो इन्टरनेट के जरिये लोग संगीत बनाते हैं, गाते हैं और  फिर वो  कहीं और रिकोर्ड होता हैमास्टर होता है और मिक्सिंग होती है.

गाने के अलावा आप गीत भी लिखती हैं?
मैं गीत भी लिखती हूं और अपने एल्बम के सभी गीत संगीतबद्ध भी करती हूं. पहले मैंने ऊषा उथुप के लिए लिखा है. उनकी एल्बम शायरारी के टाइटल ट्रैक के अलावा  चार गीत लिखे थे. जवाहर बट्टल के साथ जुडी थी. अब अपने लिए गाने लिखती हूं. पंजाबी से पोइटिक ट्रांसलेशन भी करती हूं. बुल्ले शाह, रूमीराबिया वगैरह का अनुवाद किया है.
फिलहाल संगीत को लेकर क्या योजनायें हैं
इन दिनों एक सूफी एल्बम पर काम कार रही हूं. जल्दी  ही आपके सामने आएगा.  इसके अलावा सूफी साहित्य पर अध्यन तो जारी है. बाकी समय परिवार के खुशनुमा लम्हे भी तो बिताने होते हैं.


             
                                                
   ----- राजेश कुमार

Monday, May 1, 2017

एक्सक्लूसिव इन्टरव्यू 
प्रेमचंद, मंटो बनना था लेकिन पोर्न लेखक बन गया- राहुल बग्गा


Rahul bagga




गैंग्स औफ वासेपुर फिल्म के स्क्रिप्ट राइटर अखिलेश जयसवाल बतौर निर्देषक अपनी पहली फिल्म मस्तराम लेकर आए हैं. काल्पनिक बायोपिक पर बेस्ड यह फिल्म हिंदी के पहले पोर्न व इरोटिका लेखक मस्तराम के बारे में है. गौरतलब है कि 80-90 के दशक में मस्तराम के छदम नाम से पीले पन्नों में सिमटा लुग्दी साहित्य उत्तर भारत के स्टेशनॉन, सड़कों और बुकस्टालों पर खासा लोकप्रिय था. फिल्म में मस्तराम का लीड किरदार राहुल बग्गा निभा चुके हैं. 10 साल थिएटर में काम कर चके राहुल फिल्म मस्तराम से पहले कई विज्ञापन फिल्मों समेत अनुराग कष्यप की फिल्म लव षव ते चिकन खुराना में अहम किरदार निभा चुके हैं. हाल ही में फिल्म थिएटर और टीवी से जुड़े कई पहलुओं पर उन से राजेश कुमार की बातचीत हुई.

film mastram


फिल्म मस्तराम बोल्ड औफबीट और नौनकमर्षियल सी है, डर नहीं लगा कि नवोदित कलाकार हैं, मास तक पहंच नहीं पाएंगे?
मुझे लगता है कि मस्तराम से ज्यादा कमर्षियल सब्जेक्ट कुछ हो नहीं सकता. और कभी औफबीट या कमर्षियल के बारे में सोचा नहीं. पर हां, जब अखिलेष जायसवाल से फिल्म को लेकर बात हुई, तभी तय कर लिया था कि कहानी अगर पोर्न राइटर की है तो इसका मतलब यह नहीं कि हम इसमें सैक्स सींस या पार्न एलिमेंट डालकर बेचने की कोषिष करेंगे. फिल्म एक ऐसे भोलेभाले लेखक की कहानी है जो पे्रमचंद, मंटो और केदारनाथ जैसा लेखक बनने को संशर्शरत है लेकिन सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियां उसे ऐसी चीज लिखने पर मजबूर कर देती हैं जिस चीज को वह खुद भी नहीं जानता था.

मुंबई की बसों से फिल्म के पोस्टर्स हटाए गए, फिल्म पर अष्लीलता बढ़ाने का आरोप लगा, कितनी सचाई है इस बात में?
सिर्फ गलतफहमी के चलते ऐसा हुआ. चूंकि हमने कहानी का ऐसा बैकड्राप चुना है जिसने पोर्न को हिंदी भाशा में इंट्रोडयस किया. इसलिए सबाके लगता हक् यह भी पौर्न फिल्म होगी. जबकि फिल्म में न तो सैक्स है और न ही पोर्न. हां ये कामुक जरूर है पर इसमें वल्गैरिटी नहीं है. मस्तराम की कहानियां अपने ही ढंग में कलात्मक और हास्यास्पद होती थीं. हमेे भी अपनी बात कहने के लिए हास्य का सहारा लिया है. 

मस्तराम  पोर्न साहित्य लेखक है, इसे परदे विजुलाइज करना सैंसर बोर्ड और दर्षकों के लिहाज से कितना मुष्किल रहा?
चुनौती तो थी. हमारे पास दो रास्ते थे पहला उनका लिखा विजुअल में एजइटइज बदलते जो समाज कभी नहीं स्वीकारता दूसरा आर्टिस्टिक अ्रप्रोच अपनाना. हमने दूसरा रास्ता अपनाया. हमने कौमिक ऐलिमेंट डाला. हमने मस्तराम को सटायर में यूज करने की कोषिष की..


जब बायोपिक बनती है तो फरहान अख्तर मिल्खा सिंह से मिलकर रोल तैयार करते हैें लेकिन मस्तराम के बारे में कोई नहीं जानता, फिर कैसे परदे पर उतारा मस्तराम को?
सच कह रहे हैं. षुरुआत में मेरे लिए भी कठिन था कि कैसे उस किरदार को ड्राफट करेंगे जो किसी ने देखा ही नहीं. मुझे लगता है कि मस्तराम आम लोगों के दिल में बसता था. जब मैं थिएटर में था तभी मस्तराम को पढ़ा था. मेरा परपज अलग होता था. उन की लिखावट से  कलाकारों को अभिनय में दृष्यात्मकता समझने में आसानी होती है. आप कह सकते हैं कि मेरी तैयारी तभी से चल रही है.




मस्तराम को दर्षक या समाज स्वीकारने में हिचकता क्यों है?
मस्तराम के साथ त्रासदी यह है कि एक तो वह पोर्न लिखता था वो भी हिंदी में. आज भी हमारे यहां का यूथ को हिंदी डाउन मार्केट मानता है. अगर हम किसी अंग्रेजी के पोर्न राइटर पर फिल्म बनाते तो उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती. मस्तराम की किताबें छिपछिपकर सब पढ़ते थे लेकिन स्वीकार कोई नहीं करता था. समाज के इसर रवैए को हमे दिखाया है. हालांकि अनुराग कष्यप इम्तियाल अली और तिग्मांषु जैसे फिल्मकारों के चलते लोगों की स्वतंत्र और नए सिनेमा प्रति सोच बदली है. वे अच्छे और बुरे सिनेमा में फर्क करना सीख गए हैं.

एक नए कलाकर को फिल्मों में काम पाना कितना आसान या मुष्किल प्रोसेस है?
सबसे जरूरी है खुद पर विष्वास करना कि जो वो करना चाहता उसे एक दिन जरूर हासिल होगा. किसी के लिए सफलता 15 दिन में आ जाती है कोई सालों इंतजार करता है. मेरे लिए तो यह एक कभी न खत्म होने वाली जर्नी है.

आपके लिए अभिनय के क्या मायने हैं/?
मैं समझता हूं कि अभिनय ही ऐसा माध्यम है जिस के जरिए आप वह सब कर सकते हैं जो असल जिंदगी में नहीं कर पाते. जैसे मैं इंट्रोवर्ट हूं. न कभी किसी से झगड़ा हुआ और न किसी को प्रपोज किया. लेकिन थिएटर या फिल्मों के जरिए आप अपनी जीवन के सभी इमोषन निकाल सकते हैं. हंस सकते हैं, रो सकते हैं, किसी से प्यार का इजहार भी कर सकते हैं.

फिल्म की रिलीज के बाद राहुल करियर के लिहाज से खुद को कहां देखते हैं?

मस्तराम के बाद लोग जानने लगे हैं. काम भी मिलने लगा है. मैं चाहता हूं कि इस तरह की अच्छी स्क्रिप्ट मेरे पास आएं. चूंकि थिएटर से हूं इसलिए हमेषा कोषिष रहेंगी कि जिस फिल्म में भी काम करूं उसमें समाज के लिए कोई सार्थक संदेष जरूर हो. 

-- राजेश कुमार 

Tuesday, March 7, 2017


शिक्षा में घुसपैठ करता
तर्क और अन्वेषण से परे धर्म
-- राजेश कुमार 



मशहूर जर्मन विचारक इमैनुअल कांट जो क़ानून, विज्ञान, धर्म और  इतिहास जैसे तमाम महत्वपूर्ण विषयों पर प्रभावी लेखन के लिए जाने जाते हैं, के मुताबिक़, हमारा पूरा ज्ञान हमारी इंद्रियों से शुरू होता है, फिर समझ की तरफ बढ़ता है और तर्कों पर आकर खत्म हो जाता है. जाहिर है, तर्कों से बड़ा कुछ भी नहीं.  इसमें कोई शक नहीं कि तर्क और अन्वेषण के आधार पर गढ़ी गई शिक्षा व्यवस्था ही किसी देश का मुस्तकबिल तय करती है. अगर हम अपनी शिक्षा तंत्र से तर्क और अन्वेषण जैसे अहम पहलू दरकिनार कर दें तो फिर यह किसी मदारी द्वारा बन्दर को सिखाई जाने वाली फर्जी उठापटक या किसी तोते को रटाये जाने वाले भजनों से ज्यादा कुछ नहीं रहेगी. ऐसी शिक्षा न तो किसी आविष्कार की संभावना पैदा होने देगी, न समाज को जागरूक कर पायेगी.
चिंता की बात है कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में धीरेधीरे धर्म की घुसपैठ होती जा रही है. और धर्म भी कैसा जिसमें न तो किसी तर्क की गुंजाइश है और न ही किसी तरह के अन्वेषण की. तर्क यानी किसी भी प्रथा, प्रचलन,  विचार, कथा, ऐतिहासिक तथ्य और समाजिक राजनितिक और धार्मिक मान्यता के पीछे के आवश्यक कारण, जिनसे उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है. उनके अस्तित्व को लेकर प्रमाणिकता का भान होता है और सबसे बड़ी बात यह कि वे वैचारिक और सैद्धांतिक तौर पर समाज और व्यक्ति के लिए उचित हैं भी या नहीं.
और अन्वेषण यानी ऐसी अज्ञात अथवा दूर की बातों, वस्तुओं, विचार, मान्यताओं, स्थानों आदि का पता लगाना जो अब तक सामने न आई हों. एक तरह से रिसर्च या अनुसंधान करना. हमें सोचसमझने, तर्क और अन्वेषण की क्षमता इसलिए मिली है कि हम हर बात पर आँख मूंदकर विशवास करने के बजाये उसके पीछे के सच को समझे. ईसिस प्रक्रिया के तहत हम आज तक आविष्कार. शोध के क्षेत्र में ऐसा काम कर पाएं है जो असंभव लगते हैं. लेकिन जब बात धर्म की आती है तो पता नहीं क्यों तर्क और अन्वेषण को ख़ारिज कर दिया जाता है. अगर कोई सालों पुराणी परम्परा से होने वाली नुक्सान पर अन्वेषण की बात करे तो धर्म के ठेकेदार उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं. धार्मिक संस्कार और पूजा पाठ नाम लोगों को  ठगा जाता है, पाप पुण्य के नाम पर बरगलाया जाता है, ईश्वर, वरदान के नाम पर कर्मण्य और अन्धविश्वासी बनाया जाता है. और जब कोई अपने तर्क और अन्वेषण के दम पर इन पर सवाल खड़े करता है तो उसे नास्तिक बताकर धर्मद्रोही साबित कर  दिया जाता है.
बस जैसा कहा या सुनाया जाए उस पर आँख मूँद कर भरोसा करने की शिक्षा देने वाला धर्म आखिर छात्रों को किस तरह का भविष्य दे सकता है? हजारों सालों से जिस हिन्दू व्यवस्था के हंटर की मार नारी, दलित और पिछड़े झेलते आयें हैं उसी का गुणगान स्कूली किताबों में करने का आखिर और क्या मकसद हो सकता है सिवाए इसके कि कुछ धर्म के ठेकेदार व पुरातन पंथी फिर से स्कूलों के माध्यम से आने वाली पीढी के जीन में फिर से वही सड़ीगली धर्म व्यवस्था का कैकैंसर फैलाने पर आमादा हैं.
बीते कुछ समय से लगातार स्कूलों में धर्म आधारित शिक्षा की पैरोकारी की खबीरें सुनने में आती रहीं है. कुछ मामले गौरतलब हैं;
·         हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का बयान आया कि राज्य सरकार इसी साल नए शैक्षिक सत्र से स्कूली पाठ्यक्रम में भगवद् गीता  शामिल कराएगी.
·         मुंबई से खबर आई कि छात्रों का ज्ञान बढ़ाने के लिए शहर और उपनगर में निगम के सभी स्कूलों में भगवद्गीता पढ़ाई जाएगी..
·         दिल्ली के नामी स्कूल रायन इंटरनेशनल ने नियम निकाला कि स्कूल के शिक्षकों और छात्रों को भाजपा की सदस्यता लेनी होगी. हालनी इसे ऐच्छिक बता जा रहा है.
·         भाजपा की सरकार में कर्नाटक के तत्कालीन शिक्षामंत्री ने भी सर्कुलर जारी किया था कि स्कूलों में छात्रों को प्रतिदिन 1 घंटा गीता अवश्य पढ़ाई जाए. यदि कोई इस ग्रंथ के पढ़ाने का विरोध करता है और इस का आदर नहीं करता तो उस के लिए देश में कोई जगह नहीं है.
·         1 अगस्त 2013 को शिवराज सिंह सरकार ने मध्य प्रदेश राजपत्र में अधिसूचना जारी कर मदरसों में भी गीता पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया था. .
·         राज्य सरकार ने 2011 में गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की थी.
·         वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका देवपुत्र को सभी स्कूलों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाए जाने का फैसला लिया था.


·          मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनिस द्वारा राज्य के सभी सरकारी स्कूलों को दिया गया यह आदेश भी काफी विवादित रहा था कि स्कूलों में मिड डे मील के पहले सभी बच्चे भोजन मंत्र पढ़ेंगे.
ये तो महज नाम मात्र के उदहारण है जबकि सच तो यह है इसी तरह धर्म के नाम पर शिक्षा का पाखण्ड देश के दूरदराज के गाँवों में आम है. जैसे सरस्वती शिशु मंदिर टाइप के धर्मपोषित संस्थाओं में तो हिन्दू धर्म की पूरी की पूरी घुट्टी ही पिला दी जाती है. प्रार्थना के नाम पर भगवान् का गुणगान, जिसमें सब कुछ भगवान् की मर्जी से ही  होता है, गणित, विज्ञान और तर्क के दम पर नहीं, का सन्देश छिपा होता है. संस्कृत के नाम पर ऐसे श्लोकों को रटाया जाता है जो ब्राहम्ण वादी व्यवस्था के तहत वर्गभेद की वकालत करते नजर आते हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश सरकार का शासकीय स्कूलों में योग के नाम पर सूर्य नमस्कार अनिवार्य कर देना बेहद अवैज्ञानिक तो था ही साथ में इसी से अल्पसंख्यक छात्रछात्राओं का स्वयं को अलगथलग महसूस करना स्वाभाविक था. इतना ही नहीं इसी प्रदेश में एक बार राज्य सरकार की ओर से जारी की गयी विज्ञप्ति में कहा गया था कि मध्य प्रदेश की स्कूली पुस्तकों को समावेशी बनाने की दृष्टि से गीता के अलावा अनेक धर्मों, संप्रदायों के विषय भी छात्रों के ज्ञानवर्धन के लिए पाठ्यपुस्तकों में शामिल किए गए हैं. इनमें पैगंबर हजरत मोहम्मद की जीवनी, वाकया ए करबला, गुरूनानक देव, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, क्राइस्ट, गरीब नवाज ऑफ अजमेर पर प्रोजेक्ट कार्य दिए गए हैं. अब इन प्रोजेक्ट की आड़ में इन तमाम धर्मिक मसीहाओं और चमत्कारी तथाकथित महापुरुषों का गुणगान ही तो करवाया जाएगा..
सिर्फ सरकारी या हिन्दू बाहुल्य छात्रों के स्कूलों का ही नहीं मदरसों का भी बुरा हाल है. यहाँ भी धरम जनित  शिक्षा के सहारे छात्रों को  चमत्कार, जन्नत और दोजख का पाठ पढाया जाता है. मंदसौर में निदा महिला मंडल 128 मदरसों को संचालित करता है. गुरुकुल विद्यापीठ, नाकोडा, ज्ञान सागर, संत रविदास, एंजिल और जैन वर्धमान सरीखे नाम वाले 128 मदरसों में से 78 मदरसों में मुस्लिम छात्रों के साथ हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं. हिंदू बच्चों की संख्या देखते हुए यहाँ नेमीचंद राठौर की हिंदू धर्म सोलह संस्कार, नित्यकर्म एवं मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार शीर्षक से किताब पढाई जाती है. इस किताब में नित्यकर्म, दंतधावन विधि, क्षौर कर्म, स्नान, वस्त्रर धारण विधि, आसन, तिलक धारण प्रकार, हाथों में तीर्थ, जप विधि, प्राणायाम, नित्य दान, मानस पूजा, भोजन विधि, धार्मिक दृष्टि में अंकों का महत्व और नवकार मंत्र को भी शामिल किया गया है.
कितनी हास्यास्पद बात है कि जो तिलक, तीर्थ और मंत्रो के नाम पर ब्राह्मण सदियों से बड़ेछोटे का भेद पैदा कर मन्त्रों के नाम पर दान दक्षिणा का व्यापार करते आये हैं, आज उन्ही पुराणी कुरीतियों को फर्जी वैज्ञानिक जामा पहनकर बच्चों को बरगलाया जा रहा है. कई शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में कई अंश ऐसे हैं जो छात्रों के मन में न केवल अंधविश्वास की नींव डाल रही हैं बल्कि साम्प्रदायिक भेदभाव  पैदा करती बातें भी सिखा रहे हैं. स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों की पुस्तकों का बड़ा महत्त्व होता है. इस दौरान जो पढ़ाया जाता है उस का असर हर छात्र के मन में न सिर्फ ताउम्र रहता है बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित भी होता जाता है. इसलिए छात्रों के मन में जातिगत,  धार्मिक,  सामाजिक और लैंगिक भेद पैसा करती शिक्षा किस तरह का तैयार कर रही है, चिंताजनक बात है.
अगर इन सब बातों को तर्क की कसौटी पर रखें तो भी इस तरह की शिक्षा के पक्षधरों की दलीलें बेहद खोखली नजर आती हैं. जैसा कि हरियाणा में गीता पढाए जाने के पीछे का कारण तो और भी बेहूदा है कि हिंदू धर्म से संबंधित मिथकीय महाकाव्य महाभारत  में वर्णित युद्धस्थल कुरुक्षेत्र हरियाणा में ही है. इसी युद्धक्षेत्र में  तथाकथित भगवान कृष्ण ने पांडव योद्धा अर्जुन को जो उपदेश दिए थे,  वे गीता में संकलित हैं. सोचने की बात है कि सिर्फ इसलिए कि पारिवारिक कलह और संपति विवाद की घटनाओं को महिमामंडित करतीं महाभारत और गीता में कुरुक्षेत्र का जिक्र है तो यहाँ गीता पढ़ानी ही चाहिए. का तर्क बिलकुल ऐसा ही जैसे कोई कहे कि गुजरात में हिन्दू मुसलिम दंगे हुए थे इसलिए यहाँ के स्कूलों के पाठ्क्रम में दंगो पर भी एक चैप्टर होना चाहिए.
इसी तरह मुंबई में नगर पालिका स्कूलों में गीता को लेकर गिरगांव चौपाटी में इस्कॉन के राधा गोपीनाथ मंदिर के आध्यात्मिक गुरु राधानाथ स्वामी का कहना कि टीवी, फिल्में और इंटरनेट से बच्चों के सामने हिंसा, अश्लीलता और उन्माद दिखाए जाने का खतरा है जिससे वे नकारात्मक विचार और घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो सकते हैं. अब इन्हें कौन समझाए कि जिस तरह की हिंसा, छल, कपट और ऊलजुलूल घटनाएं महाभारत में भरी पडी है, उतनी टीवी पर कोई दिखा ही नहीं सकता. और रही बात टीवी, फिल्में और इंटरनेट से बच्चों के मन में बुरा असर पड़ने की तो सबसे ज्यादा आस्था वाले धार्मिक चैनल तो उन्ही धर्मगुरुओं के है. इसी तरह इन्टरनेट पर हर मंदिर और धर्मिक ट्रस्ट की वेबसाईट है. फिल्मों के नाम पर तो अंधविश्वास और फर्जी चमत्कार्रों भरी फिल्म दी मेसेंजर ऑफ़ गॉड का उदाहरण तो सबके सामने ही है.
दिक्कत इसलिए भी है क्योंकि छात्रों को जो पढाया जाना चाहिए उसमें तथ्य, अन्वेषण की पूरी गुंजाइश हो. तभी तो उनका दिमाग तार्किक बुबुद्धिशीलता के आधार पर अपने ज्ञान को आगे ले जा पायेगा. लेकिन गड़बड़ यहीं से शुरू हो जाते है. धार्मिक ग्रन्थ, वे चाहे हिन्दू  धर्म के हों या फिर किसी और धर्म के, उनमें वर्णित घटनाएं न तो एतिहासिक तौर पर प्रमाणित है और न ही उनका कोई व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ है. कोई वास्तविक साक्ष्य‍ नहीं है कि ये चमत्कारी तथाकथित भगवान थे. जब तक इनके साक्ष्य नहीं हैं तो फिर इन पर सत्य की मुहर लगाकर छात्रों को इनकी शिक्षा देने का फैसला निहायत ही गैर तार्किक है. कई प्रगतिशील लेखक भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि शिक्षा को आस्था पर नहीं,  आलोचनात्माक अन्वेषण पर आधारित होना चाहिए.
ज्यातर मामलों मे यही देखा गया है कि स्कूलों मों गीता को पढ़ाने की अनिवार्यता पर जोर दिया जा रहा है. अब इसलिए गीता की भी बात करें तो इसमें आखिर कौन सी बात है जो छात्रों को सफल और कामयाब भविष्य दे सकती है. जिस गीता में धनसंपत्ति के नाम पर दो परिवारों की आपसी कलह और मारकाट के अलावा कुछ भी नहीं है उस से भला छात्रों को क्या शिक्षा हासिल होगी? गीता उपदेश भी कोई वैज्ञानिक प्रगति की बात नहीं करता. बल्कि अपनों की हत्या करने को उकसाता है.
नैनं छिंदंति शस्त्राणि,’ (गीता 2/23), यानी इस आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता, पढ़ते पढ़ते छात्र अगर अपने  साथियों को मारने लगें तो क्या कोई अदालत गीता का आत्मा की अमरता का तर्क मान कर इन्हें निर्दोष स्वीकार कर लेगी और बरी कर देगी? ईइतना ही नहीं इसमें कहा गया है कि चातुर्वर्ण्य ईश्वर का बनाया हुआ है (गीता, 4/13). इस का अर्थ है कि लोग ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं. ऐसी भेदभाव व ऊंचनीच की भावना से भरे ज्ञान से छात्रों को क्या लाभ हो सकता है. गीता तो यह भी कहती है कि स्त्रियां, वैश्य जाति और शूद्र जाति के लोग पापयोनि हैं. इसका मतलब छात्र अपनी माता या बहनों को पाप की पैदाइश मानें?
ऐसे ही रामायण, धार्मिक श्लोक और चापैयाँ समेत लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों में किसी न किसी बहाने भेदभाव और चमत्कारों से भरी शिक्षा देते हैं. दरअसल धर्म की शिक्षा में घुसपैठ के हिमायती तर्क के बजाये कुतर्क पर चलते हैं. क्योंकि जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां धर्म, आस्था और चमत्कारों की कोई जगह नहीं है. प्रगतिशीलता,  तर्कशीलता, वैज्ञानिेकता के दम पर ही दुनिया तरक्की कर पायी है. अगर आज भी दुनिया सूर्य को देवता और चन्द्रमा को छन्नी दिखाकर पूजती रहती तो ना कोई चन्द्रयान का मिशन सफल होता और न वैज्ञानिकों को अन्वेषण और आविष्कार के लिए कोई तथ्य मिल पाते.
दुःख तो इस बात का है कभीकभी अदालतें भी इनके साथ हो जाती हैं.  इंदौर में जब 13 नवंबर 2011 को स्कूलों में गीता पढ़ाने के निर्णय की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ गीता स्कूलों में पढ़ाया जाएगा, भले ही इसका कितना ही विरोध क्यों न हो. तो  इसका नागरिक संगठनों और अल्पसंख्यक समाज द्वारा पुरजोर विरोध किया गया. मामला हाई कोर्ट तक गया. माननीय उच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार के राज्य के स्कूलों में गीता सार पढ़ाने के निर्णय पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा कि गीता मूलत: भारतीय दर्शन की पुस्तक है, किसी भारतीय धर्म की नहीं.
यह मसला सिर्फ हमारे देश तक ही नहीं सिमटा है. दुनिया के और मुल्कों में भी  धर्मिक समूह अपने अपने बाइबल और कमांडमेंट्स को स्कूली छात्रों के नाजुक दिमाग में थोपने पर आमादा दिखते है. कहीं पॉप और केथोलिकअपने अनुयायियों में इजाफा करने के लिए ऐसा करते हैं तो  कहीं धर्म रक्षा जैसे खोखले आधारों पर धर्म शिक्षा थोपी जाती है. पत्रकार डैनियल पाइप्स के न्यूयार्क सन में 29 मार्च, 2005 को छपे लेख व्हाट आर इस्लामिक स्कूल्स टीचिंग में ओटावा के इस्लामिक स्कूल में यहूदियों के खिलाफ घृणा फैलायी जाने वाली शिक्षा का हवाला दिया है. इनके मुताबिक़ न्यूयार्क सिटी 2003 में न्यूयार्क डेली न्यूज़ ने अपनी जाँच के आधार पर पाया कि शहर के मुस्लिम स्कूलों में प्रयोग में आने वाली पुस्तकें व्यापक रुप से अनुपयुक्त,  यहूदियों और ईसाइयों कि भर्त्सना से भरी हुई और विजयी स्वर में इस्लाम की सर्वोच्चता की घोषणा करने वाली हैं. लास एंजेल्स 2001 में शहर के स्कूलों को उमर इब्न ख़तब फाउंडेशन ने 300 कुरान दान किए. परंतु इनमें सेमेटिक विरोधी भावनायें होने के कारण इन्हें पुस्तकालयों से हटा दिया गया. इस कुरान में एक पेज के नीचे लिखा गया यहूदी अपने अहंकार में दावा करते हैं कि दुनिया का सारा ज्ञान और विवेक उनके ह्र्दय में विद्यमान है. उनका यह दावा न केवल अहंकार है बल्कि धर्म द्रोह भी है. अब खबर की सचाई चाहे जो भी हो लेकिन इतना तो साफ़ हो जाता है दुनिया भर के मुल्कों में धर्म के नाम पर शिक्षा को न सिर्फ दूषित किया जा रहा है बल्कि छात्रों को प्रगतिशील भविष्य से दूर भी किया जा रहा है.
हमारे संविधान की उद्देशिका के अनुसार भारत एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है. संविधान के अनुसार राजसत्ता का कोई अपना धर्म नहीं होगा. इसके बावजूद कई बार सात्ताधारी दल किसी विशेष धर्म से लगाव  या जुड़े होने के चलते उस धर्म की शिक्षा को स्कूलों में पाठ्क्रम के माध्यम से नौनिहालों के मन में इंजेक्ट करने की कोशिश करते हैं. जो सरासर अनुचित है. दिक्कत यह भी है कि अगर आज कोई सत्ताधारी दल किसी धर्म विशेष से जुडी शिक्षा थोपता है तो कल को कोई कुरान और बाइबिल भी पाठ्यक्रम में अनिवार्य करने की बात करेगा. ऐसे में आधुनिक शिक्षा जिस पर आदमी का सामाजिक,  आर्थिक और मानसिक विकास टिका है कहाँ और कैसे पढ़ाई जायगी. फिर स्कूली शिक्षा के अस्तित्व का औचित्य ही क्या रह जाता है?  इस तरह से छात्र पंडापुरोहित या प्रवचन देने वाले साधू भले ही बन जाएँ लेकिन वैज्ञानिक, डाक्टर, वकील, इंजीनियर नहीं बन सकते. जाहिर है देश पण्डे पुजारे नहीं बल्कि वही चलाएंगे.

स्कूली शिक्षा का उद्देश्य उनकी प्रतिभा को तराशकर उनमें तर्क और अन्वेषणयुक्त वैज्ञानिक सोच पैदा करना होता है. इसलिए शिक्षकों को बच्चों को नए अन्वेषण के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. धार्मिक शिक्षा के जरिये उनको हजारों साल की पिछड़ी दुनिया में ले जाना दुनिया और समाज के साथ अन्याय है. 

Tuesday, February 14, 2017


डबिंग- वोइस ओवर करियर-
आवाज ही रोजगार है..... गर खास रहे
---  राजेश कुमार 




अगर आपकी आवाज में है कुछ खास और कुछ अलग करियर बनाने का जज्बा है तो आपकी आवाज ही आपको नौकरी, पैसा और षोहरत दिलाएगी. इसके लिए आपको बनना होगा डबिंग आर्टिस्ट. इसे वोइस आर्टिस्ट भी कहते हैं. इस करियर के जरिए आप अच्छी कमाई के साथ साथ मनोरंजन की दुनिया में अपना नाम और मुकाम भी बना सकते हैं. वैसे तो फिल्मों में हीरो हीरोइन अपने डायलाग अपनी ही आवाज में डब करते है. पर कई बार भाषाई समस्या के चलते बड़ेबड़ेे हीरोहीरोइन की आवाज आप भी बन सकते हैं. श्रीदेवी से लेकर कैटरीना कैफ तक षुरुआती दौर में हिंदी न बोल पाने के कारण अपने डायलाग डबिंग आटिस्ट के जरिए ही डब कराते थे.

कम नहीं है अवसर
आज टीवी और फिल्मों का बाजार बढता जा रहा है. भोजपुरी और साउथ फिल्मों सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी फिल्में हिंदी में डब कर चैनलों में दिखाई जा रही हैं. इसी के चलते इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढे हैं. डबिंग आर्टिस्ट की विभिन्न टीवी चैनल्स, प्रोडक्शन हाउस, रेडियो, विज्ञापनों, डाक्यूमेंट्रीं, एनिमेशन फिल्मों में खासी डिमांड है. इसके अलावा प्राइवेट स्टूडियो व डबिंग कंपनियां हैं, जो आपको इस क्षेत्र में आने का और आगे मौका देती हैं. इसके अलावा आप एक फ्रीलांसर कलाकार के रूप में  भी डबिंग आर्टिस्ट के तौर पद अपना करियर आगे बढा सकते हैं. भारत में कार्टून चैनल से लेकर डिस्कवरी और नेषनल जियोग्राफिक चैनल सभी डबिंग आर्टिस्टों की बदौलत ही तो चल रहे हैं. सिर्फ हिंदी ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रीय भाषा के जानकारों के लिए भी इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है.

कमाई भी है जोरदार
अगर इस क्षेत्र में कमाई की बात करें तो निष्चिंत हो जाइए क्योंकि आय की दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत उम्दा है. एक डबिंग आर्टिस्ट चूंकि डेली बेस, फ्रीलांसर और कांट्रेक्ट के जरिए काम कर सकते हैं इसलिए कार्य का समय और आय की कोई सीमा नहीं है. फिर भी सामान्य तौर पर एक डबिंग आर्टिस्ट प्रतिदिन 1000 से लेकर पांच हजार रुपये तक कमा सकता है. जैसे जैसे तर्जुबा बढेगा आया भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है. यदि आप कांट्रेक्ट पर काम करते हैं तो लगभग 30 हजार से लेकर 50 हजार रुपये प्रतिमाह भी कमा सकते हैं.
तकनीकी पहलू
डबिंग आर्टिस्ट को कुछ तकनीकी जानकारियों का ज्ञान भी जरूरी होता है. जैसे माइक संबंधी जानकारी. अच्छी आवाज के साथ कलाकार को माइक की सभी तकनीकियों का ज्ञान होना चाहिए, माइक को हैंडल करने के अलावा उसमें कितनी दूर या नजदीक से बोलकर डबिंग की जाए, यह जानना बहुत जरूरी है. यह सब प्रषिक्षण संस्थानों में सिखाया जाता है. इसके अलावा डबिंग दो तरीके से होती है. पैरा डबिंग और लिपसिंक. पैरा डब में आर्टिस्ट को आडियो या वीडियो पर बिना ज्यादा ध्यान दिए अनुमान के मुताबिक डबिंग करनी होती है जबकि लिपसिंक में कैरेक्टर के होठों को पढकर, उच्चारण को मैच करते हुए डबिंग करनी होती है. उदाहरण के तौर पर कई हिंदी न्यूजचैनल किसी विदेषी या फिल्मी हस्तियों की बाइट को हिंदी में दिखाने के लिए उसे पैराडब करते हैं. वहीं जब किसी मूल लैंग्वेज में डब करना होता है तो लिपसिंक की जरूरत पड़ती है. लिपसिंक तकनीक ज्यादातर कलाकर अपने डायलाग डब करने में प्रयोग करते हैं. साथ ही डबिंग कलाकार के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने चरित्र को समझे. उसके हावभाव, सिचुएषन और संवाद के अनुसार डबिंग करे.

योग्यता क्या हो
यों तो डबिंग आर्टिस्ट के लिए किसी खास योग्यता की जरूरत नहीं होती, फिर भी भाषाई ज्ञान के साथ साथ देष दुनिया की खबर होना जरूरी है. इसके अलावा बोलने की तकनीक, चरित्र के भाव को, उसके मूड को पकड़ कर बोलना, आवाज में स्पष्टता के अलावा शुद्ध उच्चारण करने की क्षमता होनी चाहिए. बीते कुछ समय से बतौर डबिंग आर्टिस्ट करियर बनाने के लिए कई तरह के संस्थानों ने कोर्स भी शुरू कर दिए हैं. इन संस्थानों में डबिंग आर्टिस्ट का प्रषिक्षण पाने के लिए कम से कम 10वीं पास अभ्यर्थियों की मांग होने लगी है.

कहां ले प्रशिक्षण
इसमें डिग्री डिप्लोमा तो नहीं, लेकिन सर्टिफिकेट इन वायस ओवर ऐंड डबिंग जैसे कोर्स बकायदा कराए जा रहे हैं. यह कोर्स मात्र एक महीने से 6 महीने के बीच के होते हैं. इसके लिए कई ऐसे संस्थान हैें जो 10 हजार से लेकर 25 हजार रुपए की फीस में डबिंग के शार्ट टर्म कोर्स के जरिए प्रशिक्षण देते हंै.
भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
डिजायर्स ऐंड डेस्टिनेशन, मुंबई
मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय
एआरएम रेडियो अकादमी
एशियन अकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा
लाइववार्स (करियर इंस्टीट्यूट इन ब्रॉडकास्टिंग फिल्म), मुंबई
मूविंग मीडिया वर्कशॉप
इएमडीआई इंस्टीट्यूट, मुंबई
जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन, मुंबई
एकेडमी ऑफ रेडियो मैनेजमेंट, हौजखास, नई दिल्ली
एशियन एकेडमी आफ फिल्म ऐंड टेलिविजन, नोएडा
आईसोम्स बैग फिल्म्स, नोएडा

द वायस स्कूल, मुंबई