Tuesday, March 7, 2017


शिक्षा में घुसपैठ करता
तर्क और अन्वेषण से परे धर्म
-- राजेश कुमार 



मशहूर जर्मन विचारक इमैनुअल कांट जो क़ानून, विज्ञान, धर्म और  इतिहास जैसे तमाम महत्वपूर्ण विषयों पर प्रभावी लेखन के लिए जाने जाते हैं, के मुताबिक़, हमारा पूरा ज्ञान हमारी इंद्रियों से शुरू होता है, फिर समझ की तरफ बढ़ता है और तर्कों पर आकर खत्म हो जाता है. जाहिर है, तर्कों से बड़ा कुछ भी नहीं.  इसमें कोई शक नहीं कि तर्क और अन्वेषण के आधार पर गढ़ी गई शिक्षा व्यवस्था ही किसी देश का मुस्तकबिल तय करती है. अगर हम अपनी शिक्षा तंत्र से तर्क और अन्वेषण जैसे अहम पहलू दरकिनार कर दें तो फिर यह किसी मदारी द्वारा बन्दर को सिखाई जाने वाली फर्जी उठापटक या किसी तोते को रटाये जाने वाले भजनों से ज्यादा कुछ नहीं रहेगी. ऐसी शिक्षा न तो किसी आविष्कार की संभावना पैदा होने देगी, न समाज को जागरूक कर पायेगी.
चिंता की बात है कि हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में धीरेधीरे धर्म की घुसपैठ होती जा रही है. और धर्म भी कैसा जिसमें न तो किसी तर्क की गुंजाइश है और न ही किसी तरह के अन्वेषण की. तर्क यानी किसी भी प्रथा, प्रचलन,  विचार, कथा, ऐतिहासिक तथ्य और समाजिक राजनितिक और धार्मिक मान्यता के पीछे के आवश्यक कारण, जिनसे उनकी विश्वसनीयता सिद्ध होती है. उनके अस्तित्व को लेकर प्रमाणिकता का भान होता है और सबसे बड़ी बात यह कि वे वैचारिक और सैद्धांतिक तौर पर समाज और व्यक्ति के लिए उचित हैं भी या नहीं.
और अन्वेषण यानी ऐसी अज्ञात अथवा दूर की बातों, वस्तुओं, विचार, मान्यताओं, स्थानों आदि का पता लगाना जो अब तक सामने न आई हों. एक तरह से रिसर्च या अनुसंधान करना. हमें सोचसमझने, तर्क और अन्वेषण की क्षमता इसलिए मिली है कि हम हर बात पर आँख मूंदकर विशवास करने के बजाये उसके पीछे के सच को समझे. ईसिस प्रक्रिया के तहत हम आज तक आविष्कार. शोध के क्षेत्र में ऐसा काम कर पाएं है जो असंभव लगते हैं. लेकिन जब बात धर्म की आती है तो पता नहीं क्यों तर्क और अन्वेषण को ख़ारिज कर दिया जाता है. अगर कोई सालों पुराणी परम्परा से होने वाली नुक्सान पर अन्वेषण की बात करे तो धर्म के ठेकेदार उसके खिलाफ खड़े हो जाते हैं. धार्मिक संस्कार और पूजा पाठ नाम लोगों को  ठगा जाता है, पाप पुण्य के नाम पर बरगलाया जाता है, ईश्वर, वरदान के नाम पर कर्मण्य और अन्धविश्वासी बनाया जाता है. और जब कोई अपने तर्क और अन्वेषण के दम पर इन पर सवाल खड़े करता है तो उसे नास्तिक बताकर धर्मद्रोही साबित कर  दिया जाता है.
बस जैसा कहा या सुनाया जाए उस पर आँख मूँद कर भरोसा करने की शिक्षा देने वाला धर्म आखिर छात्रों को किस तरह का भविष्य दे सकता है? हजारों सालों से जिस हिन्दू व्यवस्था के हंटर की मार नारी, दलित और पिछड़े झेलते आयें हैं उसी का गुणगान स्कूली किताबों में करने का आखिर और क्या मकसद हो सकता है सिवाए इसके कि कुछ धर्म के ठेकेदार व पुरातन पंथी फिर से स्कूलों के माध्यम से आने वाली पीढी के जीन में फिर से वही सड़ीगली धर्म व्यवस्था का कैकैंसर फैलाने पर आमादा हैं.
बीते कुछ समय से लगातार स्कूलों में धर्म आधारित शिक्षा की पैरोकारी की खबीरें सुनने में आती रहीं है. कुछ मामले गौरतलब हैं;
·         हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर का बयान आया कि राज्य सरकार इसी साल नए शैक्षिक सत्र से स्कूली पाठ्यक्रम में भगवद् गीता  शामिल कराएगी.
·         मुंबई से खबर आई कि छात्रों का ज्ञान बढ़ाने के लिए शहर और उपनगर में निगम के सभी स्कूलों में भगवद्गीता पढ़ाई जाएगी..
·         दिल्ली के नामी स्कूल रायन इंटरनेशनल ने नियम निकाला कि स्कूल के शिक्षकों और छात्रों को भाजपा की सदस्यता लेनी होगी. हालनी इसे ऐच्छिक बता जा रहा है.
·         भाजपा की सरकार में कर्नाटक के तत्कालीन शिक्षामंत्री ने भी सर्कुलर जारी किया था कि स्कूलों में छात्रों को प्रतिदिन 1 घंटा गीता अवश्य पढ़ाई जाए. यदि कोई इस ग्रंथ के पढ़ाने का विरोध करता है और इस का आदर नहीं करता तो उस के लिए देश में कोई जगह नहीं है.
·         1 अगस्त 2013 को शिवराज सिंह सरकार ने मध्य प्रदेश राजपत्र में अधिसूचना जारी कर मदरसों में भी गीता पढ़ाया जाना अनिवार्य कर दिया था. .
·         राज्य सरकार ने 2011 में गीता को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल करने की घोषणा की थी.
·         वर्ष 2009 में मध्य प्रदेश सरकार ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पत्रिका देवपुत्र को सभी स्कूलों में अनिवार्य तौर पर पढ़ाए जाने का फैसला लिया था.


·          मध्य प्रदेश राज्य शिक्षा मंत्री अर्चना चिटनिस द्वारा राज्य के सभी सरकारी स्कूलों को दिया गया यह आदेश भी काफी विवादित रहा था कि स्कूलों में मिड डे मील के पहले सभी बच्चे भोजन मंत्र पढ़ेंगे.
ये तो महज नाम मात्र के उदहारण है जबकि सच तो यह है इसी तरह धर्म के नाम पर शिक्षा का पाखण्ड देश के दूरदराज के गाँवों में आम है. जैसे सरस्वती शिशु मंदिर टाइप के धर्मपोषित संस्थाओं में तो हिन्दू धर्म की पूरी की पूरी घुट्टी ही पिला दी जाती है. प्रार्थना के नाम पर भगवान् का गुणगान, जिसमें सब कुछ भगवान् की मर्जी से ही  होता है, गणित, विज्ञान और तर्क के दम पर नहीं, का सन्देश छिपा होता है. संस्कृत के नाम पर ऐसे श्लोकों को रटाया जाता है जो ब्राहम्ण वादी व्यवस्था के तहत वर्गभेद की वकालत करते नजर आते हैं. इसी तरह मध्य प्रदेश सरकार का शासकीय स्कूलों में योग के नाम पर सूर्य नमस्कार अनिवार्य कर देना बेहद अवैज्ञानिक तो था ही साथ में इसी से अल्पसंख्यक छात्रछात्राओं का स्वयं को अलगथलग महसूस करना स्वाभाविक था. इतना ही नहीं इसी प्रदेश में एक बार राज्य सरकार की ओर से जारी की गयी विज्ञप्ति में कहा गया था कि मध्य प्रदेश की स्कूली पुस्तकों को समावेशी बनाने की दृष्टि से गीता के अलावा अनेक धर्मों, संप्रदायों के विषय भी छात्रों के ज्ञानवर्धन के लिए पाठ्यपुस्तकों में शामिल किए गए हैं. इनमें पैगंबर हजरत मोहम्मद की जीवनी, वाकया ए करबला, गुरूनानक देव, गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, क्राइस्ट, गरीब नवाज ऑफ अजमेर पर प्रोजेक्ट कार्य दिए गए हैं. अब इन प्रोजेक्ट की आड़ में इन तमाम धर्मिक मसीहाओं और चमत्कारी तथाकथित महापुरुषों का गुणगान ही तो करवाया जाएगा..
सिर्फ सरकारी या हिन्दू बाहुल्य छात्रों के स्कूलों का ही नहीं मदरसों का भी बुरा हाल है. यहाँ भी धरम जनित  शिक्षा के सहारे छात्रों को  चमत्कार, जन्नत और दोजख का पाठ पढाया जाता है. मंदसौर में निदा महिला मंडल 128 मदरसों को संचालित करता है. गुरुकुल विद्यापीठ, नाकोडा, ज्ञान सागर, संत रविदास, एंजिल और जैन वर्धमान सरीखे नाम वाले 128 मदरसों में से 78 मदरसों में मुस्लिम छात्रों के साथ हिंदू बच्चे भी पढ़ते हैं. हिंदू बच्चों की संख्या देखते हुए यहाँ नेमीचंद राठौर की हिंदू धर्म सोलह संस्कार, नित्यकर्म एवं मान्यताओं का वैज्ञानिक आधार शीर्षक से किताब पढाई जाती है. इस किताब में नित्यकर्म, दंतधावन विधि, क्षौर कर्म, स्नान, वस्त्रर धारण विधि, आसन, तिलक धारण प्रकार, हाथों में तीर्थ, जप विधि, प्राणायाम, नित्य दान, मानस पूजा, भोजन विधि, धार्मिक दृष्टि में अंकों का महत्व और नवकार मंत्र को भी शामिल किया गया है.
कितनी हास्यास्पद बात है कि जो तिलक, तीर्थ और मंत्रो के नाम पर ब्राह्मण सदियों से बड़ेछोटे का भेद पैदा कर मन्त्रों के नाम पर दान दक्षिणा का व्यापार करते आये हैं, आज उन्ही पुराणी कुरीतियों को फर्जी वैज्ञानिक जामा पहनकर बच्चों को बरगलाया जा रहा है. कई शिक्षण संस्थानों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में कई अंश ऐसे हैं जो छात्रों के मन में न केवल अंधविश्वास की नींव डाल रही हैं बल्कि साम्प्रदायिक भेदभाव  पैदा करती बातें भी सिखा रहे हैं. स्कूल, कालेज और विश्वविद्यालयों की पुस्तकों का बड़ा महत्त्व होता है. इस दौरान जो पढ़ाया जाता है उस का असर हर छात्र के मन में न सिर्फ ताउम्र रहता है बल्कि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को स्थानांतरित भी होता जाता है. इसलिए छात्रों के मन में जातिगत,  धार्मिक,  सामाजिक और लैंगिक भेद पैसा करती शिक्षा किस तरह का तैयार कर रही है, चिंताजनक बात है.
अगर इन सब बातों को तर्क की कसौटी पर रखें तो भी इस तरह की शिक्षा के पक्षधरों की दलीलें बेहद खोखली नजर आती हैं. जैसा कि हरियाणा में गीता पढाए जाने के पीछे का कारण तो और भी बेहूदा है कि हिंदू धर्म से संबंधित मिथकीय महाकाव्य महाभारत  में वर्णित युद्धस्थल कुरुक्षेत्र हरियाणा में ही है. इसी युद्धक्षेत्र में  तथाकथित भगवान कृष्ण ने पांडव योद्धा अर्जुन को जो उपदेश दिए थे,  वे गीता में संकलित हैं. सोचने की बात है कि सिर्फ इसलिए कि पारिवारिक कलह और संपति विवाद की घटनाओं को महिमामंडित करतीं महाभारत और गीता में कुरुक्षेत्र का जिक्र है तो यहाँ गीता पढ़ानी ही चाहिए. का तर्क बिलकुल ऐसा ही जैसे कोई कहे कि गुजरात में हिन्दू मुसलिम दंगे हुए थे इसलिए यहाँ के स्कूलों के पाठ्क्रम में दंगो पर भी एक चैप्टर होना चाहिए.
इसी तरह मुंबई में नगर पालिका स्कूलों में गीता को लेकर गिरगांव चौपाटी में इस्कॉन के राधा गोपीनाथ मंदिर के आध्यात्मिक गुरु राधानाथ स्वामी का कहना कि टीवी, फिल्में और इंटरनेट से बच्चों के सामने हिंसा, अश्लीलता और उन्माद दिखाए जाने का खतरा है जिससे वे नकारात्मक विचार और घटनाओं से आसानी से प्रभावित हो सकते हैं. अब इन्हें कौन समझाए कि जिस तरह की हिंसा, छल, कपट और ऊलजुलूल घटनाएं महाभारत में भरी पडी है, उतनी टीवी पर कोई दिखा ही नहीं सकता. और रही बात टीवी, फिल्में और इंटरनेट से बच्चों के मन में बुरा असर पड़ने की तो सबसे ज्यादा आस्था वाले धार्मिक चैनल तो उन्ही धर्मगुरुओं के है. इसी तरह इन्टरनेट पर हर मंदिर और धर्मिक ट्रस्ट की वेबसाईट है. फिल्मों के नाम पर तो अंधविश्वास और फर्जी चमत्कार्रों भरी फिल्म दी मेसेंजर ऑफ़ गॉड का उदाहरण तो सबके सामने ही है.
दिक्कत इसलिए भी है क्योंकि छात्रों को जो पढाया जाना चाहिए उसमें तथ्य, अन्वेषण की पूरी गुंजाइश हो. तभी तो उनका दिमाग तार्किक बुबुद्धिशीलता के आधार पर अपने ज्ञान को आगे ले जा पायेगा. लेकिन गड़बड़ यहीं से शुरू हो जाते है. धार्मिक ग्रन्थ, वे चाहे हिन्दू  धर्म के हों या फिर किसी और धर्म के, उनमें वर्णित घटनाएं न तो एतिहासिक तौर पर प्रमाणित है और न ही उनका कोई व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ है. कोई वास्तविक साक्ष्य‍ नहीं है कि ये चमत्कारी तथाकथित भगवान थे. जब तक इनके साक्ष्य नहीं हैं तो फिर इन पर सत्य की मुहर लगाकर छात्रों को इनकी शिक्षा देने का फैसला निहायत ही गैर तार्किक है. कई प्रगतिशील लेखक भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि शिक्षा को आस्था पर नहीं,  आलोचनात्माक अन्वेषण पर आधारित होना चाहिए.
ज्यातर मामलों मे यही देखा गया है कि स्कूलों मों गीता को पढ़ाने की अनिवार्यता पर जोर दिया जा रहा है. अब इसलिए गीता की भी बात करें तो इसमें आखिर कौन सी बात है जो छात्रों को सफल और कामयाब भविष्य दे सकती है. जिस गीता में धनसंपत्ति के नाम पर दो परिवारों की आपसी कलह और मारकाट के अलावा कुछ भी नहीं है उस से भला छात्रों को क्या शिक्षा हासिल होगी? गीता उपदेश भी कोई वैज्ञानिक प्रगति की बात नहीं करता. बल्कि अपनों की हत्या करने को उकसाता है.
नैनं छिंदंति शस्त्राणि,’ (गीता 2/23), यानी इस आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता, पढ़ते पढ़ते छात्र अगर अपने  साथियों को मारने लगें तो क्या कोई अदालत गीता का आत्मा की अमरता का तर्क मान कर इन्हें निर्दोष स्वीकार कर लेगी और बरी कर देगी? ईइतना ही नहीं इसमें कहा गया है कि चातुर्वर्ण्य ईश्वर का बनाया हुआ है (गीता, 4/13). इस का अर्थ है कि लोग ब्राह्मण हैं, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र हैं. ऐसी भेदभाव व ऊंचनीच की भावना से भरे ज्ञान से छात्रों को क्या लाभ हो सकता है. गीता तो यह भी कहती है कि स्त्रियां, वैश्य जाति और शूद्र जाति के लोग पापयोनि हैं. इसका मतलब छात्र अपनी माता या बहनों को पाप की पैदाइश मानें?
ऐसे ही रामायण, धार्मिक श्लोक और चापैयाँ समेत लगभग सभी धार्मिक ग्रंथों में किसी न किसी बहाने भेदभाव और चमत्कारों से भरी शिक्षा देते हैं. दरअसल धर्म की शिक्षा में घुसपैठ के हिमायती तर्क के बजाये कुतर्क पर चलते हैं. क्योंकि जहां तर्क, विवेक, विचार, मौलिकता और वैज्ञानिकता है वहां धर्म, आस्था और चमत्कारों की कोई जगह नहीं है. प्रगतिशीलता,  तर्कशीलता, वैज्ञानिेकता के दम पर ही दुनिया तरक्की कर पायी है. अगर आज भी दुनिया सूर्य को देवता और चन्द्रमा को छन्नी दिखाकर पूजती रहती तो ना कोई चन्द्रयान का मिशन सफल होता और न वैज्ञानिकों को अन्वेषण और आविष्कार के लिए कोई तथ्य मिल पाते.
दुःख तो इस बात का है कभीकभी अदालतें भी इनके साथ हो जाती हैं.  इंदौर में जब 13 नवंबर 2011 को स्कूलों में गीता पढ़ाने के निर्णय की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा था कि हिंदुओं का पवित्र ग्रंथ गीता स्कूलों में पढ़ाया जाएगा, भले ही इसका कितना ही विरोध क्यों न हो. तो  इसका नागरिक संगठनों और अल्पसंख्यक समाज द्वारा पुरजोर विरोध किया गया. मामला हाई कोर्ट तक गया. माननीय उच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश सरकार के राज्य के स्कूलों में गीता सार पढ़ाने के निर्णय पर अपनी मुहर लगाते हुए कहा कि गीता मूलत: भारतीय दर्शन की पुस्तक है, किसी भारतीय धर्म की नहीं.
यह मसला सिर्फ हमारे देश तक ही नहीं सिमटा है. दुनिया के और मुल्कों में भी  धर्मिक समूह अपने अपने बाइबल और कमांडमेंट्स को स्कूली छात्रों के नाजुक दिमाग में थोपने पर आमादा दिखते है. कहीं पॉप और केथोलिकअपने अनुयायियों में इजाफा करने के लिए ऐसा करते हैं तो  कहीं धर्म रक्षा जैसे खोखले आधारों पर धर्म शिक्षा थोपी जाती है. पत्रकार डैनियल पाइप्स के न्यूयार्क सन में 29 मार्च, 2005 को छपे लेख व्हाट आर इस्लामिक स्कूल्स टीचिंग में ओटावा के इस्लामिक स्कूल में यहूदियों के खिलाफ घृणा फैलायी जाने वाली शिक्षा का हवाला दिया है. इनके मुताबिक़ न्यूयार्क सिटी 2003 में न्यूयार्क डेली न्यूज़ ने अपनी जाँच के आधार पर पाया कि शहर के मुस्लिम स्कूलों में प्रयोग में आने वाली पुस्तकें व्यापक रुप से अनुपयुक्त,  यहूदियों और ईसाइयों कि भर्त्सना से भरी हुई और विजयी स्वर में इस्लाम की सर्वोच्चता की घोषणा करने वाली हैं. लास एंजेल्स 2001 में शहर के स्कूलों को उमर इब्न ख़तब फाउंडेशन ने 300 कुरान दान किए. परंतु इनमें सेमेटिक विरोधी भावनायें होने के कारण इन्हें पुस्तकालयों से हटा दिया गया. इस कुरान में एक पेज के नीचे लिखा गया यहूदी अपने अहंकार में दावा करते हैं कि दुनिया का सारा ज्ञान और विवेक उनके ह्र्दय में विद्यमान है. उनका यह दावा न केवल अहंकार है बल्कि धर्म द्रोह भी है. अब खबर की सचाई चाहे जो भी हो लेकिन इतना तो साफ़ हो जाता है दुनिया भर के मुल्कों में धर्म के नाम पर शिक्षा को न सिर्फ दूषित किया जा रहा है बल्कि छात्रों को प्रगतिशील भविष्य से दूर भी किया जा रहा है.
हमारे संविधान की उद्देशिका के अनुसार भारत एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है. संविधान के अनुसार राजसत्ता का कोई अपना धर्म नहीं होगा. इसके बावजूद कई बार सात्ताधारी दल किसी विशेष धर्म से लगाव  या जुड़े होने के चलते उस धर्म की शिक्षा को स्कूलों में पाठ्क्रम के माध्यम से नौनिहालों के मन में इंजेक्ट करने की कोशिश करते हैं. जो सरासर अनुचित है. दिक्कत यह भी है कि अगर आज कोई सत्ताधारी दल किसी धर्म विशेष से जुडी शिक्षा थोपता है तो कल को कोई कुरान और बाइबिल भी पाठ्यक्रम में अनिवार्य करने की बात करेगा. ऐसे में आधुनिक शिक्षा जिस पर आदमी का सामाजिक,  आर्थिक और मानसिक विकास टिका है कहाँ और कैसे पढ़ाई जायगी. फिर स्कूली शिक्षा के अस्तित्व का औचित्य ही क्या रह जाता है?  इस तरह से छात्र पंडापुरोहित या प्रवचन देने वाले साधू भले ही बन जाएँ लेकिन वैज्ञानिक, डाक्टर, वकील, इंजीनियर नहीं बन सकते. जाहिर है देश पण्डे पुजारे नहीं बल्कि वही चलाएंगे.

स्कूली शिक्षा का उद्देश्य उनकी प्रतिभा को तराशकर उनमें तर्क और अन्वेषणयुक्त वैज्ञानिक सोच पैदा करना होता है. इसलिए शिक्षकों को बच्चों को नए अन्वेषण के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए. धार्मिक शिक्षा के जरिये उनको हजारों साल की पिछड़ी दुनिया में ले जाना दुनिया और समाज के साथ अन्याय है. 

Tuesday, February 14, 2017


डबिंग- वोइस ओवर करियर-
आवाज ही रोजगार है..... गर खास रहे
---  राजेश कुमार 




अगर आपकी आवाज में है कुछ खास और कुछ अलग करियर बनाने का जज्बा है तो आपकी आवाज ही आपको नौकरी, पैसा और षोहरत दिलाएगी. इसके लिए आपको बनना होगा डबिंग आर्टिस्ट. इसे वोइस आर्टिस्ट भी कहते हैं. इस करियर के जरिए आप अच्छी कमाई के साथ साथ मनोरंजन की दुनिया में अपना नाम और मुकाम भी बना सकते हैं. वैसे तो फिल्मों में हीरो हीरोइन अपने डायलाग अपनी ही आवाज में डब करते है. पर कई बार भाषाई समस्या के चलते बड़ेबड़ेे हीरोहीरोइन की आवाज आप भी बन सकते हैं. श्रीदेवी से लेकर कैटरीना कैफ तक षुरुआती दौर में हिंदी न बोल पाने के कारण अपने डायलाग डबिंग आटिस्ट के जरिए ही डब कराते थे.

कम नहीं है अवसर
आज टीवी और फिल्मों का बाजार बढता जा रहा है. भोजपुरी और साउथ फिल्मों सहित कई क्षेत्रीय भाषाओं और अंग्रेजी फिल्में हिंदी में डब कर चैनलों में दिखाई जा रही हैं. इसी के चलते इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढे हैं. डबिंग आर्टिस्ट की विभिन्न टीवी चैनल्स, प्रोडक्शन हाउस, रेडियो, विज्ञापनों, डाक्यूमेंट्रीं, एनिमेशन फिल्मों में खासी डिमांड है. इसके अलावा प्राइवेट स्टूडियो व डबिंग कंपनियां हैं, जो आपको इस क्षेत्र में आने का और आगे मौका देती हैं. इसके अलावा आप एक फ्रीलांसर कलाकार के रूप में  भी डबिंग आर्टिस्ट के तौर पद अपना करियर आगे बढा सकते हैं. भारत में कार्टून चैनल से लेकर डिस्कवरी और नेषनल जियोग्राफिक चैनल सभी डबिंग आर्टिस्टों की बदौलत ही तो चल रहे हैं. सिर्फ हिंदी ही नहीं बल्कि अन्य क्षेत्रीय भाषा के जानकारों के लिए भी इस क्षेत्र में अवसरों की कमी नहीं है.

कमाई भी है जोरदार
अगर इस क्षेत्र में कमाई की बात करें तो निष्चिंत हो जाइए क्योंकि आय की दृष्टि से यह क्षेत्र बहुत उम्दा है. एक डबिंग आर्टिस्ट चूंकि डेली बेस, फ्रीलांसर और कांट्रेक्ट के जरिए काम कर सकते हैं इसलिए कार्य का समय और आय की कोई सीमा नहीं है. फिर भी सामान्य तौर पर एक डबिंग आर्टिस्ट प्रतिदिन 1000 से लेकर पांच हजार रुपये तक कमा सकता है. जैसे जैसे तर्जुबा बढेगा आया भी उसी अनुपात में बढ़ती जाती है. यदि आप कांट्रेक्ट पर काम करते हैं तो लगभग 30 हजार से लेकर 50 हजार रुपये प्रतिमाह भी कमा सकते हैं.
तकनीकी पहलू
डबिंग आर्टिस्ट को कुछ तकनीकी जानकारियों का ज्ञान भी जरूरी होता है. जैसे माइक संबंधी जानकारी. अच्छी आवाज के साथ कलाकार को माइक की सभी तकनीकियों का ज्ञान होना चाहिए, माइक को हैंडल करने के अलावा उसमें कितनी दूर या नजदीक से बोलकर डबिंग की जाए, यह जानना बहुत जरूरी है. यह सब प्रषिक्षण संस्थानों में सिखाया जाता है. इसके अलावा डबिंग दो तरीके से होती है. पैरा डबिंग और लिपसिंक. पैरा डब में आर्टिस्ट को आडियो या वीडियो पर बिना ज्यादा ध्यान दिए अनुमान के मुताबिक डबिंग करनी होती है जबकि लिपसिंक में कैरेक्टर के होठों को पढकर, उच्चारण को मैच करते हुए डबिंग करनी होती है. उदाहरण के तौर पर कई हिंदी न्यूजचैनल किसी विदेषी या फिल्मी हस्तियों की बाइट को हिंदी में दिखाने के लिए उसे पैराडब करते हैं. वहीं जब किसी मूल लैंग्वेज में डब करना होता है तो लिपसिंक की जरूरत पड़ती है. लिपसिंक तकनीक ज्यादातर कलाकर अपने डायलाग डब करने में प्रयोग करते हैं. साथ ही डबिंग कलाकार के लिए यह भी आवश्यक है कि वह अपने चरित्र को समझे. उसके हावभाव, सिचुएषन और संवाद के अनुसार डबिंग करे.

योग्यता क्या हो
यों तो डबिंग आर्टिस्ट के लिए किसी खास योग्यता की जरूरत नहीं होती, फिर भी भाषाई ज्ञान के साथ साथ देष दुनिया की खबर होना जरूरी है. इसके अलावा बोलने की तकनीक, चरित्र के भाव को, उसके मूड को पकड़ कर बोलना, आवाज में स्पष्टता के अलावा शुद्ध उच्चारण करने की क्षमता होनी चाहिए. बीते कुछ समय से बतौर डबिंग आर्टिस्ट करियर बनाने के लिए कई तरह के संस्थानों ने कोर्स भी शुरू कर दिए हैं. इन संस्थानों में डबिंग आर्टिस्ट का प्रषिक्षण पाने के लिए कम से कम 10वीं पास अभ्यर्थियों की मांग होने लगी है.

कहां ले प्रशिक्षण
इसमें डिग्री डिप्लोमा तो नहीं, लेकिन सर्टिफिकेट इन वायस ओवर ऐंड डबिंग जैसे कोर्स बकायदा कराए जा रहे हैं. यह कोर्स मात्र एक महीने से 6 महीने के बीच के होते हैं. इसके लिए कई ऐसे संस्थान हैें जो 10 हजार से लेकर 25 हजार रुपए की फीस में डबिंग के शार्ट टर्म कोर्स के जरिए प्रशिक्षण देते हंै.
भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
डिजायर्स ऐंड डेस्टिनेशन, मुंबई
मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय
एआरएम रेडियो अकादमी
एशियन अकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन, नोएडा
लाइववार्स (करियर इंस्टीट्यूट इन ब्रॉडकास्टिंग फिल्म), मुंबई
मूविंग मीडिया वर्कशॉप
इएमडीआई इंस्टीट्यूट, मुंबई
जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ कम्युनिकेशन, मुंबई
एकेडमी ऑफ रेडियो मैनेजमेंट, हौजखास, नई दिल्ली
एशियन एकेडमी आफ फिल्म ऐंड टेलिविजन, नोएडा
आईसोम्स बैग फिल्म्स, नोएडा

द वायस स्कूल, मुंबई



Saturday, September 3, 2016

रिलायंस वाला जिओ नहीं जियो पारसी का पंगा

                                                      
·         आज रात कंडोम का इस्तेमाल न करें.
·         अपनी मां से ब्रेकअप करने का क्या ये सही समय नहीं है?
·         जल्द ही शादी कर बच्चे पैदा करें, क्योंकि आपकी बेबी सिटिंग करने के लिए पैरेंट हमेशा आपके इर्दगिर्द नहीं रहेंगे. 
·         क्या तुम्हारा ब्वायफ्रेंड रतन टाटा की तरह बड़ा आदमीं बनेगा? ये जज करने वाली आप कौन होती हैं?   
   निकोल किडमैन?          
  


ये और इनके जैसे और कई जुमले देश में तेजी से घटते पारसी समुदाय पर किसी और ने नहीं बल्कि अल्पसंख्यक मंत्रालय ने एक सरकारी अभियान के जरिए कसे हैं. जियो पारसी नाम का यह अभियान इन दिनों विज्ञापन के बाजार में अपनी विवादास्पद सामग्री के चलते बेहद चर्चित है. कहने को तो यह कैम्पेन पारसी समुदाय को आबादी बढ़ाने के लिए प्रेरित करने के मकसद से केंद्र सरकार और निजी संस्था के साझे में चलाई जा रही जियो पारसी  स्कीम को प्रमोट करने के लिए बनाया गया है. लेकिन इनमें जिस तरह की तस्वीरें और तंज कसे गए हैं व हर किसी के गले नहीं उतरते. मसलन 40  पार अविवाहित पारसी,  जो अभी भी अपनी मां के साथ रह रहे हैं का मजाक उड़ना और कंडोम का इस्तेमाल न करने की नसीहत अदि. एक तरफ जहाँ अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला का कहना है कि इस अभियान के सकारात्मक परिणाम आये हैं और 8 पारसी महिलाओं ने गर्भधारण किया है. वहीँ पारसी समुदाय के इतिहास पर रिसर्च कर रहीं सिमिन पटेल के मुताबिक ये विज्ञापन जिस तरह का दबाव महिलाओं पर पैदा कर रहे हैं, उससे यही लगता है कि महिला का जीवन शादी या बच्चे के बिना अधूरा है. यह बेहद नाराज करने वाली पहल है.

बहरहाल, यहाँ मसला सरकारी अभियान की मंशा पर सवाल उठाना नहीं है बल्कि आये दिन विज्ञापनों की कथावस्तु  और फिल्मांकन में अश्लीलता, विवादास्पद संवाद, आक्रामकता, प्रतिस्पर्धा की आड़ में व्यकितगत हमला और सनसनीखेज तत्वों की बढ़ती प्रवत्ति है. इन दिनों टीवी और अखबार पर आ रहे विज्ञापनों में ज्यादातर उपभोक्ता को उत्पाद की जानकारी देने के अलावा बाकी सब कुछ बताया और दिखाया जाता है. फिर चाहे वो किस जूते के विज्ञापन में किसी महिला के नंगे बदन की नुमाइश हो, किसी कंडोम के विज्ञापन में कौफी, स्ट्राबेरी के फ्लेवर की बात हो, फलां ब्रांड न इस्तेमाल करने वाले को पिछड़ा बताना हो या धर्म की आड़ में किस्मत चमकाने वाले मंत्र, सिद्धि यन्त्र और हनुमान लोकेट के फर्जी दावे हों. कई बार तो एड फिल्म की आड़ में उन्हें बरगलाया या उकसाया तक जाता है.

रफ्यूम से इरोटिक कुछ और होता है क्या?
एक परफ्यूम का विज्ञापन देखिये, इसमें एक नवविवाहित महिला उस ब्रांड की खुशबू से इतनी बहक जाती है कि अपने पति को छोड़ सामने वाले की तरफ काम यौनेक्षा से आकर्षित होने लगती है. ऐसे ही अगर आप टूथपेस्ट में नमक या क्रिस्टल नहीं है तो फिर आप का मंजन कूड़ा है. इसी अंदाज़ में बनियान को किस्मत की चाबी बताने वाला विज्ञापन सनी देओल और जोनी लीवर से कहलवाता है कि अपना लक पहन के चलो. यानी बनियान नहीं आपकी किस्मत है, जिसकी कीमत 100 रूपए से भी कम है. सोचने वाली बात है कि बनियान को किस्मत की चाबी बताने वाली अभिनेता सनी देओल और जोनी लीवर खुद के करियर के बुरे दौर से गुजर रहे हैं. कहने का मतलब यह है जो खुद अपनी किस्मत चमकाने के लिए ऐसे विज्ञापनों का सहारा ले रहे हैं, उनके जरिये बेची जाने वाली बनियानें कैसे किसी की किस्मत चमका सकती हैं?     

विवाद, विज्ञापन और बिक्री
मॉस कम्युनिकेशन के कोर्स के दौरान हमें पढाया जाता था कि बिना विज्ञापन के किसी सामान को बेचना अँधेरे में किसी लडकी को आंख मारने जैसा है. यानी आपके सामान की बिक्री और आपका प्रयोजन बिना प्रचार के हल नहीं हो सकता. साथ ही कोर्स की किताबों में विज्ञापन के नाम का पूरा चेप्टर है. इस चेप्टर में विज्ञापन की परिभाषा का मुख्य सार यही है कि उपभोक्ता तक पहुचने के लिए जो तरीका अपनाना पड़े, अपनाए, क्योंकि बिना चर्चा के उत्पाद बिकना संभव नहीं है. शायद इसीलिए आज का विज्ञापन बाजार किसी भी प्रोडक्ट को बेचने के लिए गुणवत्ता का सहारा नहीं बल्कि विवादों (चर्चा) का सहारा लेना पसंद करता है. इसका सीधा फायदा तो यह होता है कि सम्बंधित उत्पाद चर्चा का केंद्र बन जाता है और मुफ्त की पब्लिसिटी हो जाती है. लेकिन जब इन अश्लील और विवादित विज्ञापनों को 5 साल का बच्चा घर पर टीवी में देखता है तो उसके दूरगामी नुकसान समझ में आते हैं. 

इनको भी नहीं छोड़ा.
तुर्की की हेअर रिमूवर क्रीम बेचने वाली कम्पनी ने अपने एक उत्पाद के विज्ञापन में अल कायदा के ख़ालिद शेख़ मोहम्मद की फ़ोटो लगा दी. इस कॉस्मेटिक्स कंपनी ने इस चित्र के साथ यह लिखा है, ' बाल अपने आप नहीं झड़ेंगे. जबकि ख़ालिद इन दिनों ग्वांतोनामो बंदीगृह में हैं. बाद में जब हंगामा हुआ तो सफाई में कंपनी का कहना था उसने इस फ़ोटो का प्रयोग उनके शरीर के घने बालों की वज़ह से किया उनकी आतंकी गतिविधियों की वज़ह से नहीं यही बेहूदगी और गैरजिम्मेदारी हमारे यहाँ भी दिखती है. कुछ अरसा पहले सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा नाको के बनाये कंडोम से जुड़े विज्ञापनों को लेकर खासा हंगामा हुआ था. कई विज्ञापनों की कड़ी में एक विज्ञापन में  मां अपने बेटे के दराज में कंडोम देखकर खुश होती है और कहती है मेरा बेटा बड़ा हो गया. ऐसे ही बेसहारा बच्चों को रोजगार का प्रशिक्षण देने के लिए चंदा इकठ्ठा करने के मकसद से बनाए गए दिल्ली पुलिस के विज्ञापन में लिखी पंक्तियाँ कुछ यों थी, इससे पहले की कोई इसे सर काटना सिखाए, आप इसे प्याज काटना सिखाने में मदद करें. हालाँकि दिल्ली पुलिस युवा फाउंडेशन के इस विज्ञापन पर दिल्ली बाल अधिकार सुरक्षा अयोग और कई अन्य बाल अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध जताए जाने के बाद दिल्ली पुलिस ने इस विज्ञापन को वापस ले लिया. लेकिन इन तमाम विज्ञापनों में विवाद की चाशनी में सेक्स, अंधविश्वास और आकामकता को बढ़ावा देनी की मानसिकता साफ़ झलकती है.


राजनीति में विज्ञापन
सियासी मोर्चे पर भी विज्ञापनों को लेकर विवाद और प्रतिस्पर्धा का आलम देखने को मिल जाता है. आम चुनाव से पहले एक विज्ञापन के नारे को लेकर कांग्रेस और भाजपा में ठन गयी थी. दरअसल अखबारों में कांग्रेस का एक  विज्ञापन छपा, जिसके जरिए राहुल गांधी देश को मैं नहीं, हम का संदेश दे रहे थे. विज्ञापन के चर्चा में आते ही भाजपा की तरफ से कांग्रेस पर नकलची होने के आरोप लगने लगे. भाजपा का कहना था कि कांग्रेस व राहुल गांधी ने उनका नारा चुराया है. बीजेपी का दावा था कि मैं नहीं,  हम  का नारा मोदी ने फरवरी 2011 में ही दे दिया था. इसके बाकायदा साक्ष्य भी दिखाए गए. खैर यह मामला शांत पड़ता कि नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार को लेकर एक और विज्ञापन पर बवाल तब मच गया जब पटना के अखबारों में छपे एक नकली विज्ञापन में नीतीश और मोदी एक दूसरे का हाथ पकड़े नजर आये. इस मामले को लेकर नीतेश काफी खफा हुए.  
ऐसा ही एक और विज्ञापन जिसमें गुजरात की मुस्लिम महिलाओं की बेहतर स्थिती की बात करते हुए उन्हें कंप्यूटर पर काम करते दिखाया गया था, गुजरात सरकार पर भारी पड़ गया. चूंकि ये फोटो आजमगढ़ के एक कॉलेज की थी और उन्हें एक वेबसाइट से कॉपी किया गया था, लिहाजा गुजरात सरकार ने सफाई में सारा आरोप विज्ञापन एजेंसी पर डाल दिया.
खैर ये तो महज राजनीति में परस्पर प्रतिस्पर्धा भरे विज्ञापन थे लेकिन असली समस्या उन सरकारी विज्ञापनों से है जिनकी आड़ में व्यक्तिगत या पार्टी का प्रचार होने लगता है. मसलन किसी सरकारी योजना को सरकारी के बजाये किसी ख़ास राजनीतिक व्यक्ति के नाम से प्रचारित करना. इसी के चलते वरिष्ठ शिक्षाविद माधव मेनन की अध्यक्षता में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित समिति ने एक सार्थक कदम उठाते हुए सिफारिश की थी कि सरकारी विज्ञापनों में छिपे राजनीतिक संदेश और सरकार के संदेशों में स्पष्ट अंतर होना चाहिए. समिति का कहना था कि कई बार सरकारी विज्ञापनों में सरकार की उपलब्धियों को प्रचारित करने के साथ-साथ इस धन का प्रयोग सत्तारूढ़ दल के व्यक्तियों की छवि निखारने में भी होता है. लिहाजा इन खर्चों की लेखा परीक्षा होनी चाहिए. आये दिन अखबारों में  पूरे पूरे पन्नों में छपे सरकारी विज्ञापन देखकर समझा जा सकता है कि उनमें किसकी पब्लिसिटी की जा रही है.


एड नगरी की माया अपरमपार है जी.
धर्म की मार्केटिंग                         राजनीति की तरह धरम भी कुछ ख़ास पण्डे पुजारियों और बाबाओ की लिए कमाई का बड़ा साधन बन चुका है. कई तथाकथित संतों ने बाकायदा धार्मिक चैनलों में पैसा लगा है ताकि उनकी धर्म की दुकान का प्रचार 24 घंटे बिना किसी की रोकटोक के चलता रहे. इन चैनलों में उनके धार्मिक प्रवचनों से लेकर उनके आश्रमों में बनाये जा रहे आयुर्वेदिक उत्पादों का भी विज्ञापन होता है. और जिन के पास खुद का चैनल नहीं वे के मोटी रकम कखर्च कर बड़े बड़े चैनलों पर बड़ा स्लॉट खरीदकर अपने चमत्कारों का बखान कर लोगों को भरमाते हैं. फिर चाहे वो बाबा राम देव और उनका पतंजलि संस्थान हो या फिर निर्मल बाबा का फर्जी समागम. लोगों को दुःख दूर करने के नाम पर एक घंटे का निर्मल बाबा का समागम अंधविश्वास और चमत्कार को बढ़ावा देने के अलावा और कुछ नहीं करता. निर्मल बाबा का समागम कार्यक्रम तो करीब 40 टीवी चैनलो पर प्रसारण होता है. इसके अलावा कई  छद्म आस्था की ऐड में चमत्कारी उत्पाद मसलन हनुमान यन्त्र, लक्ष्मी यन्त्र और न जाने कौन कौन से भगवान के लोकेट भजन बजा बजा कर बेचे जाते हैं. दुःख की बात तो यह है इन पाखंडियों की दूकान सजाने और चलाए रखने का काम आजकल मनोज कुमार, गोविंदा और आलोक नाथ जैसे सीनिअर अभिनेता कर रहे हैं. चंद पैसों के लिए ये अपने प्रसंशकों को गुमराह करने से भी नहीं चूकते.  

 
मोटे होना से बड़ा कोई गुनाह नहीं इनकी नज़रों में?
अश्लीलता का पुट (नारी काया की माया)
चाहे पुरुष जूतों का विज्ञापन हो या फिर अंडरविअर या शेविंग क्रीम का, इनमें पुरुष से ज्यादा महिला मॉडल  कामुकता परोसती नजर आयेंगी. पता नहीं क्यों बगैर सेक्सी लड़की को दिखाए विज्ञापन पूरा ही नहीं होता है. ब्लेड से लेकर ट्रक तक के विज्ञापन में नारी काया की माया का सहारा लिया जा रहा है. जैसा कि रिबॉक जूतों के विज्ञापन को ही ले लीजिये. इसमें एक न्यूड मॉडल ने एक जोड़ी जूतों के अलावा पूरे शरीर पर कुछ भी नहीं पहना था. फूहड़ और अश्लीलता से लबरेज इस विज्ञापन में शायद ही किसी की नजर जूतों पर गयी हो. अक्टूबर 1991 की डेबोनियर पत्रिका में मार्क रॉबिंसन और पूजा बेदी के अश्लील विज्ञापन पर भी काफी शोरशराबा हुआ था. मिलिंद सोमन और मधु सप्रे पर नग्नावस्था में फिल्माया गया एक शू कंपनी का विज्ञापन तो बहुचर्चित ही है. इसी तर्ज पर अमरीका की एक बडी वस्त्र निर्माता कंपनी ने अपने प्रचार के लिए एक अमरीकी-बांग्लादेशी मॉडल को बहुत हद तक टॉपलेस दिखा कर उसके ब्रेस्ट पर मेड इन बांग्लादेश का ठप्पा लगा दिया. इस बेहद अश्लील और द्विअर्थी विज्ञापन को सरेआम होर्डिंग में लगाकर बड़े बच्चों सबकी नजरों से गुजारा गया और तो और ऐसा ही फूहड़ हरकत एक 62 साल की मॉडल के साथ भी दोहराई जा चुकी है. किसी सामान को बेचने के लिए सेक्स और अश्लीलता परोसने की मानसिकता समझ से परे हैं. सबको पता है कि दाढ़ी केवल मर्द बनाते हैं लेकिन इन सारी चीजों को बेचने के लिए जिलेट जैसी बड़ी कंपनियां चित्रांगदा और नेहा धूपिया जैसी सेक्सी और बोल्ड अभिनेत्रियों को साइन कर रही हैं. तो क्या इसके पीछे आप कामुकता को नहीं मानते हैं.
ब्रिटेन में तो एक मोबाइल फोन ऐप न्यूड स्कैनर का टीवी विज्ञापन एक प्रमुख टीवी शो के बीच में दिखाए जाने के बाद उस विज्ञापन पर प्रतिबंध लगा दिया गया था क्योंकि इसमें न सिर्फ महिलाओं को नीचा दिखाया जा रहा था बल्कि टीवी पर उसे बच्चे भी देख रहे थे लेकिन  हमारे यहाँ ऐसे विज्ञापन प्राइम टाइम पर पूरे परिवार को बेधड़क दिखाए जाते हैं. सबसे बेतुकी बात तो हर विज्ञापन में महिला को ऑब्जेक्ट बनाकार परोसना है. भले ही औरत को सेक्सुअल रूप में पेश करने वाला दुनिया का पहला विज्ञापन अमेरिकी महिला ने ही बनाया हो लेकिन इस मामले में अब भारत सभी मुल्कों को पीछे छोड़ता नजर आ रहा है.


तू तू मैं मैं और मुनाफे की जंग 
ब्रांड वॉर और बढ़ता बाजार
एक अनुमान के अनुसार भारत में सिर्फ टेलीविज़न विज्ञापन का बाज़ार क़रीब 19 अरब डॉलर का है. एक्सपर्ट मानते हैं कि इस हिसाब से यह बाज़ार आने वाले एक दो सालों में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाज़ार बन जाएगा. बिजनेस अख़बार मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2016 तक ये आंकड़ा 54 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा. दिलचस्प बात है कि विज्ञापन बाजार में करीब 10,000 करोड़ रुपए की सबसे बड़ी हिस्सेदारी एफएमसीजी कंपनियों की ही है. जबकि दूसरा स्थान व्हाइट गुड्स (टीवी, फ्रिज, एसी आदि) कंपनियों की है, जो विज्ञापन पर सालाना 4,000-5,000 करोड़ रुपए खर्च करती हैं. इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि देश में विज्ञापन का बिजनेस कितना चरम पर है.
एड वर्ल्ड के बढ़ते बाजार में अब तक हम प्रिंट, टीवी की प्रमुख भूमिका मानते आयें है लेकिन बीते कुछ सालों इंटरनेट के जरिये विज्ञापन की अलग और बड़ी दुनिया बन चुकी है. कंडोम, सुई से लेकर घर पर पिज़्ज़ा भी आजकल ऑनलाइन माध्यमों के जरिये मंगवाने का चलन है. लिहाजा बाज़ार का विज्ञापन इस माध्यम पर भी करोड़ों लुटा रहा है. मसलन स्नैपडील, फ्लिपकार्ट और अमेजन डॉट कोम  आये दिन विज्ञापन पर करोड़ों खर्च करती हैं. ई कॉमर्स श्रेणी के इस नए बिजनेस के बदौलत बाजार में ब्रांड एस्टेब्लिशमेंट करने को लेकर प्रतिस्पर्धा और आक्रामक विज्ञापन का नया दौर सा शुरू हो गया है. हर ब्रांड प्रतिद्वंदी ब्रांड को सस्ता और हल्का बाते के लिए विज्ञापन के नए नए तरीके आजमा रहा है. कभी भारी से और डिस्काउंट की आड़ में तो कभी लकी विजेता स्कीम चलाकर.

हम को नहीं कुछ समझ, ज़रा समझाना..
यह विज्ञापन का बढ़ता प्रभाव नहीं तो और क्या है कि जो कई उद्योगपति खुद के टेलीविजन चैनल खोल रहे है. रिलायंस और विडियोकान द्वारा लाए जाने वाले समाचार चैनलों को भी इसी कवायद से जोड़ कर देखा जा रहा है. विज्ञापनों से होने वाली आय और नुकसान का अंदाजा इस घटना से भी लगाया जा सकता है कि टीवी चैनल एनडीटीवी ने टेलीविज़न ऑडियंस मेजरमेंट यानी टैम के ख़िलाफ़ ये कहते हुए मुक़दमा दायर किया था कि उसकी गलत औडियंस की गिनती के चलते चैनल को विज्ञापन से मिलने वाली आय का नुक़सान हो रहा है. 
हालांकि इससे उत्पाद कम्पनियों के बीच ब्रांड वार की स्थिति भी पैदा ही जाती जो अदालत तक पहुँच जाती है. जैसा कि महेंद्र सिंह धोनी और हरभजन सिंह के मामले में हुआ था जब एक शराब कंपनी के विज्ञापन में हरभजन के ही विज्ञापन का स्पूफ किया गया था. इस स्पूफ में मैक्डॉवेल के विज्ञापन में धोनी प्रतिद्वंद्वी कंपनी परनॉड रिकॉर्ड के ब्रांड रॉयल स्टैग के विज्ञापन में हरभजन की भूमिका का मजाक उड़ाते दिख रहे थे. इसी नाराज होकर हरभजन और उनके परिवार ने विजय माल्या की यूबी स्पिरिट्स को मैक्डॉवेल नंबर वन प्लेटिनम व्हिस्की के उस विज्ञापन के लिए नोटिस भेज दिया था.    
इससे पहले भी कई एड वॉर के चक्कर में सेलिब्रिटी और खिलाड़ी आपस में उलझ चुके हैं. कुछ साल पहले आमिर की फिल्म डेल्ही बैली में एक कार का कथित रूप से मज़ाक उड़ाए जाने पर विवाद खड़ा हो गया था. आरोप था कि फिल्म में जानबूझ कर उस कार का इस्तेमाल किया गया है, क्योंकि एक अन्य हीरो शाहरु़ख खान इस कंपनी की कार का प्रचार करते हैं. ऐसा ही वाकया डिटर्जेंट कंपनियों के मामले में दिखाई दिया. जब हिंदुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड (एचयूएल) के प्रोडक्ट रिन डिटर्जेंट और प्रॉक्टर एंड गैंबल (पी एंड जी) कंपनी के प्रोडक्ट टाइड डिटर्जेंट के विज्ञापन ने ब्रांड वॉर छेड़ दिया था. उस दौरान भी पी एंड जी ने एचयूएल के खिला़फ याचिका दायर कर दी थी. ऐसा ही विवाद कोलगेट और हिंदुस्तान लीवर्स, हॉर्लिक्स और कॉम्प्लान के बीच हो चुका है.


क्या बेचा जा रहा है, कुछ  खबर नहीं.
विज्ञापन और सेंसर
जो लोग सिनेमाहाल में फिल्में देखते हैं उन्हें पता है फिल्म से पहले दिखाए जाने वाली विज्ञापन बाकायद सेंसर सर्टिफिकेट के साथ प्रसारित होते हैं. यानी उन्हें भी सेंसर बोर्ड के पास कांटछांट के लिए भेजा जाता है. ताजुब की बात है कि सेंसर बोर्ड की कैंची फिल्मों को सामाजिक दुष्प्रभाव वाले कंटेंट के चलते क़तर देती है लेकिन विज्ञापनों को नहीं कतरती जो दिन में सैकड़ों बार हर आयु वर्ग के दर्शकों को दिखाए जाते हैं. केबल और डीटीएच के इस दौर में दिन-रात विज्ञापनों से ही टीवी चैनल्स की कमाई होती है. ऐसे में सभी तरह के अनसेंसर्ड कमर्शियल विज्ञापन, (ख़ास तौर पर निर्मल बाबा और लक्ष्मी यन्त्र जैसे अंधविश्वास फैलाने वाले) दिनरात प्रसारित होते रहते हैं. हालांकि कुछ वक्त पहले एक दर्शक की शिकायत पर बोर्ड ने अंडरवियर के दो विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगाया था. इन विज्ञापनों में एक मॉडल अंडरवियर को धोते हुए अश्लील एक्प्रेशन देती है. इसी तरह एक डियोड्रेंट का विज्ञापन भी उत्तेजकता की अति के चलते बैन किया गया. यहां ग़ौर करने वाली बात यह है कि उक्त सभी प्रतिबंध जनता की शिकायत के बाद लगाए गए. मतलब यह कि उससे पहले बोर्ड को कोई सुध ही नहीं थी.

ग़ौरतलब है कि इसे भी बैन किया गया था. लेकिन आज ऐसे सैकड़ों विज्ञापन हिंसा और अश्लीलता को बढ़ावा दे रहे हैं और बोर्ड खामोश है. जब कोई जागरूक दर्शक अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी के नाते शिकायत दर्ज कराता है, तब जाकर बोर्ड की नींद टूटती है. छोटे निर्माताओं की फिल्मों एवं विज्ञापनों के लिए बोर्ड को सारे क़ानून और सांस्कृतिक मूल्य याद आ जाते हैं, जबकि बड़े निर्माताओं की फिल्मों में क्रिएटिविटी, कला की दृष्टि या कहानी की मांग का बहाना बनाकर कुछ भी दिखा दिया जाता है. यही वजह है कि आज लोग सेंसर बोर्ड की प्रमाणिकता पर सवाल उठाने लगे हैं.

विज्ञापन से जुडा रेसिज्म का मसला 
कहा जा सकता है कि विज्ञापन सूचना देने का जरिया होते हैं लेकिन यह अवधारणा अब पूरी तरह से खंडित हो चुकी है. आज तो विज्ञापन का बाजारू करोबार जो दिखता है वही बिकता है  के तर्ज पर चल रहा है. मांग और आपूर्ति की अवधारणा को तोड़ते हुए अब मांग पैदा करने पर जोर है. आज विज्ञापन का मूल उद्देश्य सूचना प्रदान करने की बजाए उत्पाद विशेष के लिए बाजार तैयार करना बन कर रह गया है.  काश उत्पादकों और विज्ञापन निर्माताओं को एहसास होता कि वे अपने लक्ष्यों को पाने की एवज में वह अपने नैतिक कर्तव्य को ना नकारें बल्कि अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को भी समझें.


                                                                                              ----   RAJESH S. KUMAR